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Coronavirus: कोरोना से लड़ाई में कितना जरूरी हथियार है वेंटिलेटर?

Wed, 01 Apr 2020 11:29 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: निलेश कुमार Updated Wed, 01 Apr 2020 11:29 AM IST
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Coronavirus Why ventilators are a frontline weapon against Covid-19 treatment
Coronavirus Ventilator - फोटो : Social Media

भारत में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले बढ़ते जा रहे हैं। यहां अब तक 1200 से ज्यादा लोगों में सक्रमण की पुष्टि हुई है और 32 की मौत हो चुकी है। दिल्ली में निजामुद्दीन की मरकज बिल्डिंग में तबलीग़ी जमात के सैकड़ों लोग मिलने के बाद से मामला और गंभीर हो गया है। यहां पर 1500 से 1700 लोग मौजूद थे जिनमें से कई लोगों में कोरोना वायरस जैसे लक्षण पाए गए हैं। इस घटना से कोरोना वायरस का संक्रमण और बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। सरकार लगातार संक्रमण के तीसरे चरण यानी कम्यूनिटी ट्रांसमिशन को रोकने की कोशिश कर रही है। इसके लिए भारत में 21 दिनों का लॉकडाउन भी किया गया है।

Coronavirus Why ventilators are a frontline weapon against Covid-19 treatment

वेंटिलेटर की व्यवस्था
इसके साथ ही मेडिकल उपकरणों की कमी को भी पूरा किया जा रहा है। कोरोना वायरस के गंभीर मामलों को देखते हुए वेंटिलेटर की व्यवस्था भी की गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को 30,000 वेंटिलेटर तैयार करने का ऑर्डर दिया गया है। नोएडा की AgVa हेल्थकेयर को एक महीने में 10 हजार वेंटिलेटर्स बनाने का ऑर्डर दिया गया है। इनकी आपूर्ति अप्रैल के दूसरे हफ्ते से होनी शुरू हो जाएगी।

इसके अलावा ऑटोमोबाइल निर्माताओं को भी वेंटिलेटर्स बनाने के लिए कहा गया है। वहीं, स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक देश के विभिन्न अस्पतालों में मौजूद वेंटिलेटर्स में से 14,000 से ज्यादा कोविड-19 मरीजों के लिए लगाए गए हैं। जिन मरीजों की हालत गंभीर होती है वेंटिलेटर उनकी जान बचाने में मदद करता है। वेंटिलेटर की जरूरत कब पड़ती है और आने वाले समय में भारत इसकी आपूर्ति के लिए कितना तैयार है?

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वेंटिलेटर

कैसे काम करता है वेंटिलेटर
वेंटिलेटर एक ऐसी मशीन है जो किसी मरीज की सांस लेने में मदद करती है। ये फेफड़ों में ऑक्सीजन डालती है और कार्बन डाईऑक्साइड निकालती है। वेंटिलेटर को लाइफ सेविंग मशीन भी कहा जाता है क्योंकि ये उस वक्त इस्तेमाल की जाती है जब मरीज के फेफड़े काम करना बहुत कम कर देते हैं। सर्जरी से पहले भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

वेंटिलेटर मशीन में एक ट्यूब जुड़ी होती है जिसे मरीज के मुंह, नाक या गले में छोटे से कट के जरिए शरीर में डाला जाता है। कोविड19 के इलाज में तकरीबन 5 फीसदी मरीजों को ही क्रिटिकल केयर की जरूरत पड़ती है। ऐसे लोगों को उपचार के लिए आईसीयू में भर्ती किया जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक कोविड19 के 80 प्रतिशत मरीज बिना अस्पताल में इलाज के ठीक हो जाते हैं। लेकिन, छह मरीजों में से एक गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं और उन्हें सांस लेने में दिक्कत आती है।

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कोरोना वायरस में वेंटिलेटर की जरूरत
कोरोना वायरस से संक्रमण के गंभीर मामलों में वायरस फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने लगता है। इंसान के फेफड़े शरीर में वो जगह हैं जहां से ऑक्सीजन शरीर में पहुंचना शुरू होती है और कार्बन डाई ऑक्साइड शरीर से बाहर निकलती है।

अगर ये वायरस आपके मुंह से होते हुए सांस की नली में प्रवेश करता है और फिर आपके फेफड़ों तक पहुंचता है तो आपके फेफड़ों में छोटे-छोटे एयरसैक बना देता है। कोरोना के बनाए छोटे-छोटे एयरसैक में पानी जमने लगता है। इस कारण सांस लेने में तकलीफ होती है और आप लंबी सांस नहीं ले पाते।

इस स्टेज में मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ती है। ऐसे में वेंटिलेटर फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचाता है। वेंटिलेटर में ह्यूमिडीफायर भी होता है जो हवा में गर्माहट और नमी शामिल करता है और उससे शरीर का तापमान सामान्य बना रहता है।

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फेफड़ों का काम करती है
इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन (आईएससीसीएम) के अध्यक्ष डॉक्टर ध्रुव चौधरी बताते हैं, "कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की तीन कैटेगरी मान सकते हैं। पहली कैटेगरी जिसमें मरीज को हल्के-फुल्के लक्षण जैसे जुकाम होता है। इसमें उसे घर पर ही क्वारंटीन में रहने को बोला जाता है।"

"अस्पताल में एडमिट करने की जरूरत नहीं होती। दूसरी कैटेगरी में तेज बुखार और सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। तब मरीज को अस्पताल में एडमिट किया जाता है और उसे ऑक्सीजन दी जाती है। तीसरे कैटेगरी के मरीजों में फेफड़ों को नुकसान हो जाता है। इससे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने की फेफड़ों की क्षमता बहुत कम हो जाती है। ये मल्टी ऑरगन फेलियर की स्थिति होती है। इसलिए मरीज को वेंटिलेटर पर डाला जाता है। तब मशीन एक तरह से फेफड़ों का काम करती है।"

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