वो सोमवार का दिन था। जर्मनी के माइन्ट्स में करीब 50 बरस की उम्र के दो वैज्ञानिक एक खास खबर के इंतजार में थे। इन दोनों ने पूरी जिंदगी कैंसर का उपचार खोजने में लगा दी थी। इनके माता-पिता 1960 के दशक में तुर्की से जर्मनी आए थे। तब ये भी तय नहीं था कि उन्हें जर्मनी की नागरिकता मिलेगी भी या नहीं लेकिन अब उनकी अगली पीढ़ी, यानी इस दंपति की गिनती जर्मनी के सबसे अमीर लोगों में होती है। ये मुकाम मेडिकल क्षेत्र में इनकी कामयाबियों ने दिलाया है। तभी, समाचार एजेंसियों ने वो खबर प्रसारित की, जिसका जश्न ये दोनों एक रात पहले ही मना चुके थे।
Coronavirus Vaccine: क्या मिल गई कोरोना महामारी से बचाने वाली वैक्सीन? विस्तार से जानिए इसके बारे में सबकुछ
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लेकिन क्या दुनिया को वो वैक्सीन मिल गई है जो कोरोना महामारी को खत्म कर सकती है? अमेरिका के आला हेल्थ पब्लिकेशन स्टाट न्यूज की रिपोर्टर हेलेन ब्रांसवेल इस सवाल का जवाब देते हुए कहती हैं कि फाइजर ने जो टेस्ट किए, उसके नतीजे एक अच्छी खबर है। इससे ये जाहिर हुआ कि जिन कई अन्य वैक्सीन पर काम चल रहा है, वो प्रभावी साबित होंगी। वजह ये है कि वो सभी स्पाइक प्रोटीन को ध्यान देते हुए तैयार की जा रही हैं।
हेलेन ब्रांसवेल बताती हैं कि स्पाइक प्रोटीन है क्या?
वे बताती हैं, 'अगर आपने कोरोना वायरस की तस्वीर देखी हो तो आप इसके ऊपर कुछ उभरा हुआ सा हिस्सा देखते हैं, कुछ कुछ मुकुट जैसा। ये स्पाइक प्रोटीन है, जो वायरस के ऊपर रहता है।' हेलेन कहती हैं, 'कुछ लोग ये कह सकते हैं कि वैक्सीन तैयार कर रहे वैज्ञानिकों ने तमाम अंडे एक ही टोकरी में रख दिए। वो कहेंगे कि स्पाइक प्रोटीन को ध्यान में रखते हुए वैक्सीन बनाना ठीक नहीं है, लेकिन फाइजर के नतीजे बताते हैं कि स्पाइक प्रोटीन सही लक्ष्य था।' मॉडर्ना और फाइजर ने जो टेस्ट किए, उनके नतीजों ने उस तकनीक की कामयाबी के भी संकेत दिए जिसे बरसों से तैयार किया जा रहा था, लेकिन उसे इंसानों पर कभी इस तरह इस्तेमाल नहीं किया गया था।
संक्रमण पर प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी?
वैक्सीन की इस प्रक्रिया में जेनेटिक कोडिंग का इस्तेमाल हुआ है। हेलेन ब्रांसवेल इसे और ज्यादा स्पष्ट तरीके से समझाती हैं। उनके मुताबिक, 'हमें जिस प्रोटीन की जरूरत होती है, उसे तैयार करने के लिए हमारा जिस्म हर वक्त मैसेंजर आरएनए का इस्तेमाल करता है। वैक्सीन में मौजूद मैसेंजर आरएनए कोशिकाओं को बताता है कि उस प्रोटीन को कैसे तैयार किया जाए। उसके बाद जब आप कोरोना वायरस का मुकाबला करते हैं तब आपके इम्यून सिस्टम में वो एंटीबॉडी मौजूद होते हैं जो इसे पहचान कर संक्रमित कोशिका से जुड़ने से रोक देते हैं।'
जश्न की तमाम वजहों के बीच अब भी कुछ सवाल बाकी हैं। मसलन वैक्सीन के जरिए हासिल इम्यूनिटी कब तक रहेगी? और क्या इससे संक्रमण पर प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी? हेलेन ब्रांसवेल इस सवाल पर कहती हैं, 'आपने हर्ड इम्यूनिटी के बारे में सुना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि वैक्सीन हमें उस स्थिति में पहुंचा सकती है, जहां तमाम ऐसे लोग होंगे जिनके पास वायरस से मुकाबले के लिए प्रतिरक्षा होगी, जिससे वायरस बहुत तेजी से नहीं फैले। अगर वैक्सीन संक्रमण नहीं रोक पाती है, तब मुश्किल स्थिति होगी।'
ऐसे में हम महामारी के जल्दी खत्म होने की कितनी उम्मीद लगा सकते हैं? हेलेन कहती हैं कि विज्ञान में कुछ हासिल करने के लिए वक्त लगता है, लेकिन इस बीच सरकारें वैक्सीन तैयार करने की योजनाएं जोरदार तरीके से बना रही हैं और अब ऐसा लगता है कि उनके पास चुनने के लिए कई विकल्प मौजूद रहेंगे। प्रोफेसर अजरा गनी लंदन के इंपीरियल कॉलेज में संक्रामक रोग महामारी विभाग से जुड़ी हैं। वो इस वायरस के फैलने के तरीके पर अध्ययन करती हैं। साथ ही ये जानकारी भी जुटा रही हैं कि महामारी पर काबू पाने के लिए वैक्सीन लोगों के अलग-अलग समूहों तक कैसे पहुंचाई जाएगी।