कोविड-19 महामारी ने लोगों को उनकी सेहत को लेकर जागरूक करने का काम किया है। लोगों को इस बात का बखूबी अहसास कराया है कि स्वस्थ जीवन के लिए रोग-प्रतिरोधक क्षमता का बेहतर होना कितना जरूरी है। यह जटिल नेटवर्क ही वो हथियार है जो हमारे शरीर को बीमारियों और संक्रमण से सुरक्षित रखता है। शरीर के किसी भी दूसरे हिस्से की तरह, प्रतिरक्षा प्रणाली भी साल-दर-साल कमजोर होती जाती है, जिसका सीधा मतलब ये है कि हमारे बीमार पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। हमारे संक्रमित होने की आशंका बढ़ जाती है। यह एक बड़ा कारण है कि ऐसे समय में जब कोविड महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया तो बुजुर्गों को ज्यादा एहतियात बरतने के दिशा-निर्देश दिए गए। विशेषज्ञों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि जो लोग 65 साल की उम्र के पार हैं, उनके संक्रमित होने की आशंका काफी अधिक है। उनके लिए जोखिम तुलनात्मक रूप से अधिक है। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हमारा इम्यून सिस्टम बढ़ती उम्र के समानुपात में ही कमजोर हो।
Coronavirus: रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर हो, इसके लिए आखिर क्या करें?
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इम्यून सिस्टम
- इस्रायल के टेक्नियोन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में इम्यूनोलॉजिस्ट शाई शेन-ऑर ने कहा, 'हम ऐसे कई लोगों को जानते हैं जोकि 80 साल के हैं लेकिन उनका इम्यून सिस्टम 62 साल का है। कई मामले इसके बिल्कुल उलट भी होते हैं।' अच्छी खबर यह है कि हम अपने इम्यून सिस्टम के कमजोर होने की प्रक्रिया को कम कर सकते हैं और उसके लिए हमें सिर्फ कुछ बातें अपनानी हैं। लेकिन इससे पहले की हम उन चरणों की बात करें जिससे इम्यून सिस्टम को लंबे समय तक दुरुस्त रखा जा सकता है, ये याद कर लेना जरूरी है कि हमारा इम्यून सिस्टम काम कैसे करता है।
'टी' कोशिकाएं और 'बी' कोशिकाएं
इम्यून सिस्टम की दो शाखाएं हैं। हर एक शाखा अलग प्रकार की श्वेत रुधिर कोशिकाओं (डब्ल्यूबीसी-व्हाइट ब्लड सेल्स) से बनी होती है। ये कोशिकाएं विशेष तौर पर हमारे शरीर की सुरक्षा के लिए काम करती हैं। जन्मजात रोग-प्रतिरोधक प्रतिक्रिया हमारे शरीर की सुरक्षा के लिए प्राथमिक तौर पर उत्तरदायी होती हैं। जैसे ही हमारे शरीर में कोई बाहरी चीज या रोगाणु प्रवेश करता है, हमारा इम्यून सिस्टम एक्टिव हो जाता है।
ब्रिटेन स्थित बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ इंफ्लेमेशन एंड एजिंग में डायरेक्टर जैनेट लॉर्ड कहती हैं, 'इस प्रतिक्रिया में न्यूट्रोफिल्स होते हैं, जो मुख्य तौर पर बैक्टीरिया पर हमला करते हैं। मोनोसाट्स इम्यून सिस्टम को व्यवस्थित करने में मदद करते हैं और साथ ही ये दूसरी प्रतिरक्षा कोशिकाओं को संक्रमण के खिलाफ अलर्ट करने का भी काम करते हैं। इसके अलावा एनके यानी किलर सेल्स भी होती हैं जो वायरस और कैंसर से लड़ने का काम करती हैं। जब हम बूढ़े होने लगते हैं तो ये तीनों कोशिकाएं भी तुलनात्मक तौर पर ठीक से काम नहीं कर पातीं।'
सार्स-कोविड-वायरस-2
फिर एक अनुकूलन प्रतिक्रिया भी होती है, जो टी और बी लिम्फोसाइट्स से बनी होती है। ये एक विशेष प्रकार के रोगजनकों से लड़ते हैं। इस प्रतिक्रिया का असर दिखने में कुछ दिन का समय लगता है, लेकिन एक बार हो जाने के बाद ये उस रोगजनक को याद कर लेते हैं और अगर वो रोगजनक दोबारा से शरीर पर आक्रमण करता है तो यह उसे याद रखते हैं और उनसे लड़ते हैं। वो कहती हैं, 'जब आप बुजुर्ग होने लगते हैं तो आपके शरीर में नई लिम्फोसाइट्स कम बनने लगती है, लेकिन आपको सार्स-कोविड-वायरस-2 जैसे नए संक्रमणों से लड़ने के लिए उनकी जरूरत तो होती ही है। और यहां तक कि अगर आपके शरीर ने पहले कभी किसी रोगजनक से लड़ने के लिए लिम्फोसाइट्स बनाई हो और अगर ढलती उम्र में वही रोगाणु दोबारा हमला करे, तो वो लिम्फोसाइट्स उतने कारगर तरीके से लड़ नहीं पाते।' ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं है कि उम्र बढ़ने के साथ ना सिर्फ शरीर कमजोर होता है बल्कि इसका असर इम्यून सिस्टम की प्रक्रिया पर भी पड़ता है।
फ्लू वैक्सीन
सहज प्रतिक्रिया से कुछ और कोशिकाएं पैदा होती हैं, लेकिन ये उतनी अच्छी तरह से काम नहीं करती हैं और अनुकूलन प्रतिक्रया कुछ भी लिम्फोसाइट बनाती हैं (यह अस्थि मज्जा में बनती है और एंटीबॉडी बनाती है) और कुछ टी लिम्फोसाइट्स (जो थाइमस में बनते हैं और रोगजनकों की पहचान करने और उनको मारने का काम करते हैं)। लॉर्ड बताती हैं, 'टी कोशिकाओं में कमी के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि 20 साल की उम्र में थाइमस सिकुड़ना शुरू कर देता है। यह छोटा होता जाता है और जब एक इंसान 65 या 70 साल का होता है तो यह सिर्फ तीन प्रतिशत ही बचा रह जाता है।'
वो कोशिकाएं जो रोगजनकों से जुड़ी जानकारी संग्रहित करके रखती हैं, जब वे नष्ट होती हैं तो इंसान संक्रमण के प्रति प्रतिक्रिया देने की क्षमता भी खो देता है। साथ ही टीकों को लेकर भी उदासीनता आने लगती है। शाई शेन-ऑर के मुताबिक, 'अगर बात फ्लू वैक्सीन की ही करें तो, 65 साल की उम्र के करीब 40 फीसदी बुजुर्ग वैक्सीन के प्रति प्रतिक्रिया नहीं देते हैं।'