शास्त्र कहते हैं, भविष्य में क्या होने वाला है, यह परमपिता ब्रह्मा के अलावा कोई नहीं जानता, इंसान के हाथ में सिर्फ भविष्य को सुखमय बनाने का प्रयास मात्र है, पर मौजूद परिस्थितियों की दूरबीन से भविष्य का जो दृश्य नजर आता है, वह न सिर्फ डराने वाला है, साथ ही इंसानों और जानवरों के अस्तित्व पर बड़ा प्रश्न चिन्ह भी लगाता है। इस काल्पनिक दूरबीन से वास्तविक भविष्य के नजारे देखिए, आंखें जल जाएंगी। चारों तरफ आग उगलता वातावरण, प्रतिकूल परिस्थितियां और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती हमारी आने वाली पीढ़ियां, आपको साफ नजर आएंगी। संभव है कि कल क्या होने वाला है, आप उससे बेखबर हों, पर ये नजारे वास्तविक भविष्य का दर्पण हैं। आज प्रकृति के साथ हम जिस प्रकार का खिलवाड़ कर रहे हैं, भविष्य के यह दृश्य उसका संभावित परिणाम हैं।
Exclusive: हम औसत 50°C तापमान की तरफ बढ़ रहे हैं, संभले नहीं तो खड़ी हो सकती हैं अस्तित्व के लिए चुनौतियां
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साल दर साल बिगड़ते हालात
भारत के तापमान में साल दर साल तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। 28 अप्रैल तक के भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़े दिमाग सुन्न कर देने वाले हैं। 122 वर्षों में इस साल का अप्रैल महीना सबसे गर्म रहा है। अप्रैल में उत्तर पश्चिम भारत में औसत अधिकतम तापमान 35.9 डिग्री सेल्सियस रहा है, जो लंबी अवधि के औसत से 3.35 डिग्री अधिक है। अप्रैल 2010 की तुलना में, अप्रैल 2022 में दर्ज 35.4 डिग्री का औसत तापमान तुलनात्मक दृष्टि से 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है।
अप्रैल का महीना तो वैसे भी उत्तरी भारत में गर्मियों का शुरुआत माना जाता है। मई-जून में हालात और भी गंभीर होने की आशंका है। मौसम विज्ञान के महानिदेशक डॉ. एम. महापात्र ने हाल ही में चेतावनी जारी करते हुए कहा कि आने वाले दिनों में उत्तर भारत में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस को पार कर सकता है।
डर का माहौल अभी बस यहीं खत्म नहीं हो जाता है। 30 अप्रैल को इनसैट 3डी, कॉपरनिकस सेंटिनल 3 और नासा के एक उपग्रह द्वारा ली गई तस्वीरें और भी डराने वाली हैं। इन सेटेलाइट इमेजस के अनुसार उत्तर पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में सतही भूमि का तापमान 60 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो गया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो हमारा शरीर किसी भी हालत में इतना तापमान झेल नहीं सकता।
ऐसे हालात सिर्फ भारत में ही नहीं हैं, पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के कुछ हिस्सों की स्थिति और भी भयावह है। पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र के तुरबत में पिछले कुछ हफ्तों से तापमान 50 के पार बना हुआ है। हालात ऐसे हैं कि यहां तेज धूप और गर्मी के कारण गेहूं की फसल लगभग चौपट हो गई है। स्थिति ऐसी है कि 'जो इस गर्मी से बच जाएगा, उसे अन्न की कमी मार डालेगी'।
आखिर इतना तापमान बढ़ने का कारण क्या है?
जिस हालात से हमने आपको रूबरू कराया है, उससे आप इतना तो अंदाजा लगा ही चुके होंगे कि हमारा भविष्य 'आग का दरिया है, और इसमें तैर कर कहां ही जाएंगे?'
खैर, इस संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर साल-दर साल तापमान इस रफ्तार से बढ़ता क्यों जा रहा है? इस सवाल के उत्तर को समझने के लिए हमें इसके प्रमुख दो कारणों- पहला प्रकृति के विनाश और दूसरा कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ते उत्सर्जन के बारे में समझना होगा।
पहले प्रकृति के विनाश के बारे में बात करते हैं। इंसान चालक तो है, पर ज्यादा चालाकी और अधिक पाने की चाहत हमेशा नुकसान ही करती है। प्रकृति के साथ ऐसा ही हुआ है। उद्योग, इमारतों के निर्माण के चलते बड़ी संख्या में जंगलों को खत्म किया गया। साल 2019 के आंकड़े बताते हैं कि वनों की कटाई के कारण वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 11 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। उष्णकटिबंधीय वनों की कटाई से कार्बन उत्सर्जन तेज हो रहा है। ग्रीन हाउस गैस थर्मल इंफ्रारेड रेंज के भीतर ऊर्जा को अवशोषित और उत्सर्जित करती हैं। मोटे तौर पर समझें तो ये पृथ्वी पर ऊष्मा को बढ़ाने वाले कारक हैं।
अब आते हैं कार्बन उत्सर्जन पर, चूंकि पेड़ों की हो रही कटाई के कारण स्वाभाविक रूप से ऑक्सीजन का उत्पादन कम और कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने लगता है। इसके लिए सिर्फ हमारा सांस छोड़ना ही जिम्मेदार नहीं है। सीमेंट उत्पादन, वनों की कटाई के साथ-साथ कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन के जलने के कारण भी यह तेजी से बढ़ता है।
कार्बन डाइऑक्साइड धरती के वायुमंडल को गर्म करने वाली ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी करने लगता है। कार्बन उत्सर्जन और ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ना तापमान को बढ़ाने लगता है।
आंकड़े हमारे कारनामों को स्पष्ट करते हैं। चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है।
क्या इस खतरे से अनजान है दुनिया?
अब तक के बिंदुओं से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान, हमारे अस्तित्व के लिए गंभीर विषय है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम वास्तव में इस खतरे से अनजान हैं? अगर नहीं तो इस दिशा में क्या काम किए जा रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि इस खतरे से वैश्विक संगठन अनजान हैं या फिर इसको लेकर काम नहीं किया जा रहा है। विशेषज्ञ कहते हैं, वातावरण किसी एक देश या महाद्वीप के लिए अलग नहीं है, ऐसे में इसके लिए वैश्विक स्तर पर सतत प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। समय-समय पर इसको लेकर सम्मेलन आयोजित किए जाते रहे हैं, जिससे वैश्विक संगठनों को एक मंच पर लाकर इस विषय की गंभीरता और इसकी रोकथाम को लेकर प्रयास किए जा सकें। हालांकि जानकारों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर किए जा रहे प्रयास कागजी ज्यादा होते हैं, वास्तविकता में इसका क्रियान्वयन उस स्तर का नहीं है।
पेरिस, जलवायु परिवर्तन सम्मेलन
जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को लेकर प्रयास और रोकथाम का लक्ष्य बनाने के लिए साल 2015 में 21वें जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में 196 देशों ने शिरकत की थी। इस सम्मेलन के दौरान वैश्विक स्तर पर बढ़ रहे तापमान को दो डिग्री से नीचे तक सीमित करने का लक्ष्य बनाया गया था। हालांकि क्रियान्वयन के स्तर पर देखा जाए तो यहां ज्यादा काम कागजी ही दिखता है।
इस लक्ष्य को लेकर किए गए विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने पाया कि तापमान कम करने का भले ही लक्ष्य बनाया गया है, पर यह कम होने की जगह साल-दर-साल बढ़ता ही रहा है। हाल के शोध में वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दशक के अंत तक यानी कि साल 2030 तक कार्बन उत्सर्जन के 16 फीसदी बढ़ने की आशंका है, जिससे तापमान में और बढ़ोतरी आ सकती है। पेरिस समझौते में जो लक्ष्य बनाया गया है उसके के लिए कार्बन उत्सर्जन को 40 फीसदी घटाने की आवश्यकता है।
कितने चिंतित हैं दुनिया के लीडर्स-
1. भारत की प्रतिबद्धता
भारत, वैश्विक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर अक्सर मुखर रहा है। साल 2021 में ग्लासगो में हुए जलवायु परिवर्तन COP26 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने इस विषय पर अपने लक्ष्य से दुनिया को अवगत कराया था। प्रधानमंत्री ने कहा था-
''हम साल 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को नेट जीरो करने की दिशा में काम कर रहे हैं।''
नेट जीरो का मतलब कार्बन के उत्सर्जन को खत्म करने से है। चीन साल 2060 जबकि अमेरिका 2050 तक इस लक्ष्य को पाने की दिशा में काम कर रहा है। कई देशों के मुकाबले प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन को लेकर भारत अपनी पीठ जरूर थपथपा सकता है। आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका ने साल 2019 में प्रति व्यक्ति के हिसाब से 15.5 टन और रूस ने 12.5 टन कार्बन उत्सर्जन किया, भारत के लिए यह आंकड़ा दो टन के करीब का ही रहा।
2. न्यूजीलैंड की प्रतिबद्धता
जलवायु परिवर्तन और ग्रीनहाउस गैसों के नियंत्रण को लेकर न्यूजीलैंड के प्रयास की विशेषज्ञ सराहना करते हैं। न्यूजीलैंड सरकार ने 2050 तक बॉयोजेनिक मीथेन के साथ अन्य सभी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन शून्य करने का लक्ष्य रखा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने जलवायु परिवर्तन को 'आपातकालीन स्थिति' बताते हुए साल 2025 तक कार्बन न्यूट्रल गवर्नमेंट बनाने की कोशिशों को जोर दिया था।
3.अमेरिका की प्रतिबद्धता
अमेरिका भी वैश्विक मंचों पर लगातार इन विषयों को लेकर चर्चा करता रहा है, हालांकि शोध के रिपोर्ट इसके प्रयासों को कागजी ज्यादा बताते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति बनने के बाद से जो बाइडेन अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में इसपर ज्यादा आक्रामक जरूर दिखे थे, पर योजनाएं उस हिसाब से चरितार्थ होती कम ही दिखती हैं।
उदाहरण के लिए बाइडेन सरकार ने 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दिया था, पर आंकड़े इसके विपरीत नजर आते हैं। साल 2035 तक देशभर में 100% स्वच्छ विद्युत ग्रिड बनाने का अभियान चलाया गया था हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में देखें तो अकेले व्हाइट हाउस में रोशनी के लिए ही 25 फीसदी अधिक कोयला जलाया गया।
बढ़ते तापमान के खतरे को लेकर क्या कहते हैं पर्यावरण विशेषज्ञ?
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान की गंभीरता को और बेहतर ढंग से समझने के लिए हमने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर (पर्यावरण विभाग) डॉ कृपाराम से संपर्क किया। डॉ कृपाराम कहते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह अत्यंत गंभीर विषय है, पर दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हम इसकी गंभीरता को समझ नहीं रहे हैं। जलवायु परिवर्तन को सिर्फ तापमान बढ़ने तक ही सीमित नहीं करना चाहिए, इसका वाटर बॉडीज पर भी गंभीर असर होता है जो तापमान बढ़ने के बाद प्रक्रिया स्वरूप ग्रीन हाउस गैस को बढ़ाने का कारक हैं।
अलबिडो के स्तर में हो रहा बदलाव भी बड़े चिंता का कारण है। अलबिडो, सोलर रेडिएशन का मापक है, जिसके आधार पर धरती पर सूर्य की ताप आने के बाद यह वातावरण में कितना रिफ्लेक्ट हो रहा है, उसे मापा जाता है।
जलवायु परिवर्तन को लेकर योजना और क्रियान्वयन के सवाल के जवाब में डॉ कृपाराम कहते हैं, यह बड़ा दुर्भाग्य है कि इस दिशा में योजना और जमीनी हकीकत में काफी फर्क है। उदाहरण के लिए कागजों में हर साल पर्यावरण संरक्षण को लेकर करोडों पेड़ लगाने के दावे किए जाते हैं, पर हकीकत में लगाए गए पेड़ों में से कितने जीवित हैं? इसका कोई डेटा नहीं होता।
डॉ कृपाराम कहते हैं, कार्बन उत्सर्जन की रोकथाम वैश्विक स्तर का विषय है जिसमें सभी देशों को मिलकर काम करना होगा। एक के प्रयास से कुछ नहीं होने वाला। हां, लोकल स्तर पर इसके लिए भारत सरकार को सोलर पैनल बढ़ाने की दिशा में काम करने की जरूरत है। बिजली के लिए लोगों को अधिकांशत: सोलर पैनल पर निर्भर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए, जिससे ईंधन के रूप में कोयले को जलाना कम हो सके। सोलर पैनल को बढ़ावा देने और हर घर पर इसे लगाने के लिए सरकार को सब्सिडी देने पर काम करना चाहिए, जिससे बिजली के लिए हमारी कोयले पर निर्भरता कम हो सके।
इसके अलावा बड़े स्तर पर हर साल पेड़ लगाने और जंगलों की कटाई को रोकने की सख्त योजनाएं होनी चाहिए। बिना पेड़ों को बढ़ाए कार्बन उत्सर्जन की रोकथाम नहीं की जा सकती। पेड़ लगाने के साथ इसकी देखरेख पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उज्जवला योजना, इस दिशा में सराहनीय कदम है इससे लोकल स्तर पर काफी मदद मिल रही है। पर्यावरण संरक्षण, एक सतत प्रक्रिया है, इसमें योजना बनाने से ज्यादा उसके क्रियान्वयन पर जोर देना होगा।