शरीर में दर्द होना सामान्य है, इसके कई कारण हो सकते हैं। हालांकि अक्सर या लगातार होते रहने वाले दर्द की स्थिति आपको काफी असहज कर देने वाली हो सकती है। शारीरिक, मानसिक और जीवनशैली से जुड़ी दिक्कतें आपको दर्द की अनुभव करा सकती हैं। मांसपेशियों में तनाव जैसे ज्यादा बैठने या गलत पोस्चर, चोट-मोच या सूजन और संक्रमण के कारण आपको दर्द हो सकता है। इसके अलावा कुछ मानसिक स्थितियां जैसे तनाव और चिंता के कारण भी आपको सिरदर्द, गर्दन या पीठ में दर्द हो सकता है।
Chronic Pain: शरीर में अक्सर बना रहता है दर्द तो हो जाइए सावधान, जल्दी करा लें इलाज वरना हो सकता है डिप्रेशन
क्रोनिक दर्द की स्थिति मूड, नींद, सामाजिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न कर सकती है।
आमतौर पर ये दर्द सामान्य उपायों और दवाओं से ठीक हो जाते हैं पर अगर आपको लगातार दिक्कत बनी रहती है तो सावधान हो जाइए। क्रोनिक दर्द की स्थिति मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और डिप्रेशन (अवसाद) का भी कारण बन सकती है।
लंबे समय तक बने रहने वाले दर्द से डिप्रेशन का खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि पुराने या लंबे समय तक बने रहने वाले दर्द से पीड़ित 40% वयस्कों में अवसाद का खतरा हो सकता है। फाइब्रोमायल्जिया, कमर दर्द और आर्थराइटिस से पीड़ित लोग हों या नोसिप्लास्टिक के दर्द के शिकार, ऐसे मरीजों में डिप्रेशन होने का जोखिम सबसे ज्यादा देखा गया है।
नोसिप्लास्टिक का दर्द तब उत्पन्न होता है जब नर्वस सिस्टम के दर्द को प्रोसेस करने के तरीके में बदलाव आ जाता है। वहीं, फाइब्रोमायल्जिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें मरीज को शरीर में व्यापक दर्द, थकान, नींद और मूड संबंधी विकार होते हैं।
अध्ययन में क्या पता चला?
जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जामा) में प्रकाशित शोध में 50 देशों के 3.5 लाख से अधिक लोगों के 376 सर्वेक्षणों का विश्लेषण किया गया। सबसे अधिक रिपोर्ट की गई क्रोनिक दर्द की स्थितियों में फाइब्रोमायल्जिया, कमर दर्द और आर्थराइटिस (रुमेटाइड अर्थराइटिस) शामिल हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा कि पुराने दर्द वाले मरीजों की मानसिक स्वास्थ्य जांच अनिवार्य होनी चाहिए। तीव्र दर्द किसी चोट या सर्जरी के कारण हो सकता है, लेकिन इसके पुराने दर्द में बदलने की प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक कारकों की भूमिका हो सकती है। 1970 के दशक में विकसित बायोसाइकोसोशल मॉडल के अनुसार, दर्द का अनुभव जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों से प्रभावित होता है।
दर्द का डिप्रेशन से क्या रिश्ता है?
क्रोनिक दर्द की स्थिति मूड, नींद, सामाजिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न कर सकती है और इसका आत्म-सम्मान पर भी प्रभाव पड़ता है। क्रोनिक दर्द मूड को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है, जिससे उदासी, हताशा और चिड़चिड़ापन की भावनाएं बनी रह सकती हैं, जो अवसाद के लक्षण हैं। दर्द की स्थिति नींद के पैटर्न को भी बाधित कर देती है, जिससे थकान और मूड से संबंधित दिक्कतें होती हैं। लंबे समय में इस वजह से अवसाद का खतरा बढ़ जाता है।
न्यूजीलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ओटागो के डॉ. ब्रॉन्विन थांपसन के अनुसार, उदाहरण के लिए कमर दर्द या गठिया जैसी स्थितियों का इलाज अक्सर दर्द की तीव्रता को सीमित ही कर पाता है, इसलिए मरीजों को लंबे समय तक दर्द के साथ जीना पड़ता है। ऑकलैंड यूनिवर्सिटी की डॉ. डेबी बीन ने बताया कि पुराना दर्द काम और रिश्तों को भी प्रभावित करने लगता है। चिंता और अवसाद शरीर के दर्द प्रतिक्रिया तंत्र को बदल देते हैं।
महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित
शोध के लेखकों के अनुसार, महिलाओं, युवाओं और नोसिप्लास्टिक दर्द (दर्द की अनुभूति में परिवर्तन के कारण) से पीड़ित लोगों में अवसाद और चिंता की आशंका सबसे अधिक होती है। महिलाओं में इसका कारण हार्मोनल चक्र और भावनात्मक प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। द लैंसेट के एक 2023 के अध्ययन के मुताबिक, खराब नींद, तनाव, थकान और मोटापा (बीएमआई 30 से अधिक) जैसे कारक तीव्र दर्द को क्रोनिक दर्द में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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स्रोत और संदर्भ
Prevalence of Depression and Anxiety Among Adults With Chronic Pain
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