कैंसर दुनियाभर में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक रहा है। समय के साथ कैंसर की जांच के लिए आधुनिक उपकरण और कारगर उपचार विधियां तो आई हैं, लेकिन इसपर होने वाले खर्च के कारण आम लोगों के लिए अब भी इन तक पहुंच मुश्किल बनी हुई है। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि दुनियाभर में पिछले कुछ वर्षों में कोलन (कोलेरेक्टल) कैंसर और इसके कारण होने वाले मौत के मामले काफी बढ़ गए हैं।
Cancer: कोलन कैंसर का पता लगाना हुआ आसान, बस देना होगा ब्लड सैंपल, वैज्ञानिक बोले- बच सकेगी 90% रोगियों की जान
ब्लड टेस्ट से चलेगा कैंसर का पता
न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन के परिणाम में बताया गया है कि कोलन कैंसर के अब तक के स्क्रीनिंग के लिए स्टूल सैंपल लिए जाते रहे हैं, जिसमें घर पर शौच का सैंपल एकत्र करना, उसे जांच के लिए भेजना और कोलोनोस्कोपी के लिए बेहोशी जैसी प्रक्रिया इसके निदान को कठिन बना देती है। जिसके कारण बड़ी संख्या में लोगों में इस कैंसर का पता ही नहीं चल पाता था, हालांकि अब सिर्फ ब्लड सैंपल से ही काम चल जाएगा।
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में लिखा है कि अगर अमेरिका में हर किसी की नियमित रूप से जांच की जाए, तो कोलोरेक्टल कैंसर से जुड़ी 90% मौतों को टाला जा सकता है। यह टेस्ट इस दिशा में काफी मददगार साबित हो सकती है।
कैसे काम करती है ब्लड टेस्टिंग?
कोलोरेक्टल कैंसर अमेरिका में कैंसर से होने वाली मौतों का दूसरा प्रमुख कारण है और कुल मिलाकर ये कैंसर के सबसे आम प्रकारों में से भी एक है। अकेले अमेरिका में ही हर साल डेढ़ लाख से अधिक लोगों में इस कैंसर का निदान किया जाता है और हर साल 50,000 से अधिक लोग बृहदान्त्र या मलाशय के कैंसर से मारे जाते हैं। अब इस ब्लड टेस्ट से समय रहते कैंसर का पता लगाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
वैज्ञानिकों ने बताया, इस खास प्रकार के रक्त परीक्षण से ट्यूमर से रक्त प्रवाह में रिलीज किए गए डीएनए का पता लगा सकता है। अब तक 7,800 से अधिक लोगों के परीक्षण में इस नए टेस्ट को 87% सटीक पया गया है, गलत रिपोर्टिंग दर 10% से भी कम है। हालांकि यह परीक्षण उन्नत प्रीकैंसरस घावों का पता लगाने में कम सफल रहा।
दूसरे टेस्टों की तुलना में आसान और कारगर
शोधकर्ताओं ने बताया, अब तक स्टूल टेस्ट से कोलन कैंसर का जल्दी पता लगाने की दर लगभग 42% जबकि और कोलोनोस्कोपी की दर 93% तक सटीक रही है। ब्लड टेस्ट इन सभी प्रक्रियाओं से आसान और कारगर साबित हो सकता है।
हालांकि अमेरिकन गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिकल एसोसिएशन का कहना है कि ब्लड टेस्टिंग से कैंसर का पता लगाना एक अतिरिक्त तरीका हो सकता है, लेकिन इसे कोलोनोस्कोपी का विकल्प नहीं माना जा सकता है।
कैंसर स्क्रीनिंग की गाइडलाइन
गौरतलब है कि वर्तमान स्क्रीनिंग दिशानिर्देशों के मुताबिक औसत जोखिम वाले लोगों के लिए हर 10 साल में कोलोनोस्कोपी या वार्षिक स्टूल टेस्ट जरूर कराना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, इस नए रक्त परीक्षण की हर 3 साल में जरूरत हो सकती है। निर्माता गार्डेंट हेल्थ के अनुसार, इसी साल एफडीए द्वारा इस टेस्ट को स्वीकृति प्रदान की जाने की उम्मीद है। कैंसर के समय रहते निदान में इस टेस्ट के आने से विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है।
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स्रोत और संदर्भ
A Cell-free DNA Blood-Based Test for Colorectal Cancer Screening
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