भारत में सदियों से आयुर्वेद को विश्वसनीय चिकित्सा पद्धति के रूप में देखा जाता रहा है। पुराणों में भी आयुर्वेद के माध्यम से तमाम तरह की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के सफल उपचार का जिक्र मिलता है। पर क्या मौजूदा समय में भी आयुर्वेद के प्रति लोगों का वैसा ही विश्वास है? विशेषज्ञों की मानें तो आजादी के बाद लोगों और आयुर्वेद के बीच की दूरी बढ़ती चली गई। इसके कई कारण हो सकते हैं, हालांकि पिछले कुछ वर्षों में एक बार फिर लोगों का विश्वास इस तरफ बढ़ता हुआ देखा जा रहा है। आयुर्वेद की विश्वसनीयता को और बढ़ाने के लिए इससे संबंधित अनुसंधानों पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि बिना प्रमाण सिद्ध किए लोगों का इस तरफ विश्वास बना पाना कठिन है।
आयुष मंत्रालय संग अमर उजाला की पहल: कोरोना में कारगर है इन औषधियों का सेवन, अध्ययन में दावा
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अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान की निदेशक, डॉ तनुजा नेसरी कहती हैं कि दुनियाभर में आयुर्वेद के इस्तेमाल को बढ़ाने और लोगों में इसके प्रति विश्वास को स्थापित करने के लिए सही दिशा में अनुसंधान के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। आयुर्वेद के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए लोगों में इसके प्रति विश्वास को जगाना होगा। यह विश्वास तभी आएगा जब मौजूदा समय की समस्याओं के मापदंड में आयुर्वेद की प्रभाविकता को सिद्ध करने के पर्याप्त साक्ष्य लोगों के सामने पेश किए जाएंगे। कोरोना के संदर्भ में आयुर्वेद के लाभ को प्रमाण के साथ पेश करके लोगों में इसके प्रति विश्वास को बढ़ाने में मदद मिल सकती है। आज के समय की मुख्य जरूरत है वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ आयुर्वेद की प्रस्तुति करना।
विश्वसनीयता को लिए अनुसंधान को मापदंड मानते हुए इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों के बारे में सीसीआरएएस के निदेशक जनरल डॉ एन श्रीकांत ने बताया कि आयुष मंत्रालय इस दिशा में निरंतर प्रयास कर रहा है। मंत्रालय ने आयुष रिसर्च एंड डवेलपमेंट टास्क फोर्स का गठन किया है। इसे प्रो. भूषण पटवर्धन के नेतृत्व में संचालित किया जा रहा है। इस कमेटी ने कई सारी औषधियों का परीक्षण किया है। इसी क्रम में कोरोना के रोगियों के लिए आयुष-64 दवा पेश की गई। कई अन्य संस्थानों के साथ मिलकर अब तक 122 क्लीनिकल स्टडी किए जा चुके हैं। इसमें कोविड-19 जैसे रोगों की रोकथाम और मैनेजमेंट से संबंधित 60 अध्ययन शामिल हैं।
कोविड-19 और आयुष-64 दवा
आयुष-64 को लेकर किए गए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि इस दवा का सेवन कोरोना के एसिम्टोमैटिक से लेकर माइल्ड-माडरेट रोगियों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। रोगियों को स्टैंडर्ड केयर के साथ आयुष-64 दवा देने से काफी लाभ मिलने के साक्ष्य मिले हैं। इस दवा को लेने से 6-7 दिनों में कोविड-19 के लक्षणों को कम होते देखा गया है। एक सप्ताह तक इस दवा का सेवन करने वाले लोगों का आरटी-पीसीआर भी निगेटिव देखने को मिला। इसके अलावा कोरोना के कारण होने वाली नींद और पेट से संबंधित समस्या और तनाव-घबराहट को भी आसानी से इस दवा के माध्यम से कम किया जा सकता है।
अश्वगंधा पर शोध
वैज्ञानिकों ने अश्वगंधा को लेकर करीब 78 अध्ययन किए हैं। इसमें पाया गया कि अश्वगंधा के साथ गिलोय का सेवन करने वाले लोग कोरोना संक्रमण से 95 फीसदी तक सुरक्षित हो सकते हैं। इसके बाद भी जिनको संक्रमण हुआ उनमें गंभीर मामले नहीं देखे गए। इसके अलावा करीब 20 संस्थानों द्वारा 90 हजार लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि आयुष मंत्रालय का आयुष रक्षा किट भी कोरोना में काफी अधिक सुरक्षा दे सकता है । इसी आधार पर भारत सरकार ने प्रोफेसर बीएम कटौच के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया जिसने आयुष-64 के अलावा अश्वगंधा और गिलोय को कोविड-19 के क्लीनिकल मैनेजमेंट प्रोटोकॉल में शामिल किया। इसे कोविड-19 के उपचार के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सकों की सलाह पर लिया जा सकता है।