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काका हाथरसी के व्यंग्य बाण, इसे नहीं पढ़ा तो कुछ भी नहीं पढ़ा

Sun, 18 Sep 2016 04:18 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Sun, 18 Sep 2016 04:18 PM IST
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social media gives tribute to kaka hathrasi and recall his poetry
मशहूर हास्य कवि और व्यंग्यकार काका हाथरसी का आज जन्मदिन है। 18 सितंबर, 1906 में हाथरस में जन्मे काका हाथरसी हिंदी जगत के दिग्गज हास्य कवि थे। काका हाथरसी की कविता जगत में अपनी अलग ही शैली थी। आज भी अनेक लेखक और व्यंग्य कवि काका की रचनाओं की शैली अपनाकर लाखों श्रोताओं और पाठकों का मनोरंजन कर रहे हैं। साल 1995 में वे 18 सितंबर को ही इस दुनिया से चले गए थे।


काका हाथरसी आज भी अपनी रचनाओं के जरिए लोगों के दिलों में जिंदा है, शायद यही वजह है कि उनकी पुण्यतिथि पर सोशल मीडिया उनकी रचनाओं सराबोर है। आईए, आपको भी रू-ब-रू कराते हैं काका हाथरसी की समाज पर कटाक्ष करती कुछ मशहूर वंयग्य-रचनाओं से - 
social media gives tribute to kaka hathrasi and recall his poetry
सारे जहाँ से अच्छा...

सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा
हम भेड़-बकरी इसके यह ग्वारिया हमारा
सत्ता की खुमारी में, आज़ादी सो रही है
हड़ताल क्यों है इसकी पड़ताल हो रही है
लेकर के कर्ज़ खाओ यह फर्ज़ है तुम्हारा
सारे जहाँ से अच्छा .......

चोरों व घूसखोरों पर नोट बरसते हैं
ईमान के मुसाफिर राशन को तरशते हैं
वोटर से वोट लेकर वे कर गए किनारा
सारे जहाँ से अच्छा .......

हिन्दी के भक्त हैं हम, जनता को यह जताते
लेकिन सुपुत्र अपना कांवेंट में पढ़ाते
बन जाएगा कलक्टर देगा हमें सहारा
सारे जहाँ से अच्छा .......
social media gives tribute to kaka hathrasi and recall his poetry
अनुशासनहीनता 

बिना टिकिट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर
जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर
खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू
पकड़ें टी.टी., गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू
गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना
प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना
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social media gives tribute to kaka hathrasi and recall his poetry
भ्रष्टाचार

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका' कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले - भागो, खत्म हो गया आटा
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घूस माहात्म्य

कभी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचार
ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार
बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी
माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी
कहँ ‘काका’, क्या नाम पायेगा ऐसा बंदा
जिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा
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