चीन के साथ सीमा विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार सुबह अचानक लेह पहुंच गए। सीमा की अग्रिम चौकी पर पहुंचकर उन्होंने दुश्मन के सामने सीना तानकर डटे हमारे जवानों का हौसला बढ़ाया। अपने भाषण में उन्होंने भारतीय जवानों की बहादुरी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लेह, लद्दाख से लेकर सियाचिन और करगिल तक...गलवां का बर्फीला पानी, हर पर्वत, इसकी हर चोटी भारतीय जवानों की बहादुरी की गवाह है।
पीएम मोदी ने इस दौरान रिजांग ला का भी जिक्र किया। 1962 में यहीं पर मेजर शैतान सिंह ने यहां अपनी बहादुरी का परिचय दिया था। 1962 का नवंबर महीना, बर्फ से ढकी लद्दाख की चुशुल घाटी उस समय तोप के गोलों और गोलियों की आवाजों से गूंज उठी जब भारतीय सेना के 120 जवानों पर चीनी सेना के लगभग छह हजार सैनिकों ने हमला कर दिया।
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चीन के सैनिकों का सामना करते भारतीय वीर सिपाही
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कड़ाके की ठंड के बीच चीनी सेना ने लद्दाख के रेजांग ला में घुसपैठ शुरू कर दी। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस इलाके की सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना की सबसे पुरानी रेजीमेंट 13 कुमाऊं के कंपनी लीडर मेजर शैतान सिंह के हाथों में थी।
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चीनी सेना पर नजर बनाए हुए भारतीय सैनिक
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भारतीय सेना ने इस युद्ध में चीनी सैनिकों का मुकाबला मुख्य रूप से 303 राइफल के साथ किया था। कुछ सैनिकों के पास ही ऑटोमेटिक मशीनगन थी। अधिक ऊंचाई के कारण भारतीय सेना के पास एक भी भारी हथियार नहीं था जिससे चीनी सेना के आक्रमण का मुकाबला किया जा सके। सैनिकों के पास गर्म कपड़े तक नहीं थे। कई सैनिकों के पास जूते तक नहीं थे। गोलियां भी सीमित संख्या में थी।
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चीन युद्ध में इस्तेमाल की गई गाड़ी
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इस कंपनी की पोजीशन एक पहाड़ी के पीछे थी। उनकी सहायता के लिए पीछे से आर्टिलरी (तोप) से भी फायर नहीं किया जा सकता था। वहीं सामने से वे दुश्मन के तोपों के निशाने पर थे।
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चीनी सैनिकों के समाने खड़े भारतीय सैनिक
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इस कंपनी के पास भीषण बर्फबारी में रहने लायक कपड़े तक नहीं थे। माइनस में तापमान होने के कारण भारतीय सेना के अधिकतर हथियारों से फायर तक नहीं हो पा रहा था। लेकिन उन्होंने चीनी सेना के सामने समर्पण करने के बजाए युद्ध करने का फैसला किया।