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अटल-ठाकरे से मोदी-उद्धव तक भाजपा- शिवसेना की हिचकोलों से भरी दोस्ती की कहानी
Tue, 19 Feb 2019 11:32 AM IST
Prabudhh Jain
निलेश कुमार, अमर उजाला, नई दिल्ली
निलेश कुमार, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Prabudhh Jain
Updated Tue, 19 Feb 2019 11:32 AM IST
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भाजपा-शिवसेना में बनी सहमति
- फोटो : अमर उजाला
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भाजपा और शिवसेना ने आखिरकार एक बार फिर से लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ लड़ने का फैसला लिया है। सोमवार को दोनों पार्टियों के बीच सीटों का बंटवारा तय हुआ और इसी के साथ दोनों में चली आ रही रार खत्म हो गई। भाजपा 25 सीटों पर तो शिवसेना 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। तीन दशक पहले दोनों पार्टियां हिंदुत्व के मुद्दे पर एक हुई थी।
Relation of BJP and Shivsena
- फोटो : Collected from Social Media
भाजपा और शिवसेना का गठबंधन 1989 में शुरू हुआ। तीन दशक पुराने गठबंधन का नेतृत्व शिवसेना ने किया। 1995 में शिवसेना-भाजपा के गठबंधन वाली सरकार जब पहली बार महाराष्ट्र में आई तो शिवसेना के मनोहर जोशी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया।
मनोहर जोशी ने अपने पांच साल के कार्यकाल में इस्तीफा दे दिया जिसके बाद नारायण राणे को आठ महीने के लिए राज्य की कुर्सी की जिम्मेदारी सौंपी गई। उसी साल हुए चुनाव में भाजपा ने बीएमसी की 28 सीटों पर कब्जा जमाया जबकि साल 2017 के बीएमसी चुनाव में भाजपा को शानदार 82 सीटें मिली जो शिवसेना से मात्र 2 सीट कम थी।
ये भी पढ़ें- शिवसेना से दोस्ती पर क्यों मजबूर हुई भाजपा, क्या खोया-क्या पाया?
मनोहर जोशी ने अपने पांच साल के कार्यकाल में इस्तीफा दे दिया जिसके बाद नारायण राणे को आठ महीने के लिए राज्य की कुर्सी की जिम्मेदारी सौंपी गई। उसी साल हुए चुनाव में भाजपा ने बीएमसी की 28 सीटों पर कब्जा जमाया जबकि साल 2017 के बीएमसी चुनाव में भाजपा को शानदार 82 सीटें मिली जो शिवसेना से मात्र 2 सीट कम थी।
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Atal-Adwani-Balasaheb
- फोटो : Social media
1989 में गठबंधन के बाद साल 1995 में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा गठबंधन को बहुमत मिला। शिवसेना की ओर से पहले मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने और फिर नारायण राणे, जबकि भाजपा की ओर से गोपीनाथ मुंडे को राज्य के गृह मंत्री बनाया। शिवसेना-भाजपा गठबंधन की सरकार 1999 तक चली।
साल 1999 में महाराष्ट्र में फिर कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने शिवसेना-भाजपा गठबंधन को सत्ता से बेदखल किया। साल 2004 और 2009 में शिवसेना-भाजपा ने साथ मिलकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ा। सभी चुनाव में इस गठबंधन को करारी हार झेलनी पड़ी।
साल 1999 में महाराष्ट्र में फिर कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने शिवसेना-भाजपा गठबंधन को सत्ता से बेदखल किया। साल 2004 और 2009 में शिवसेना-भाजपा ने साथ मिलकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ा। सभी चुनाव में इस गठबंधन को करारी हार झेलनी पड़ी।
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Atal-Adwani-Balasaheb-Modi
- फोटो : Collected from Social Media
साल 2004 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना करीब-करीब बराबर की हैसियत रखते थे। भाजपा को महाराष्ट्र में 54 सीटें मिली जबकि शिवसेना को 62 सीटें, लेकिन 2014 में मोदी लहर में भाजपा ने शिवसेना को मात देते हुए अपने सीनियर होने की धाक दिखाई।
भाजपा ने यहां की 288 सदस्यीय विधानसभा में से 122 सीटें जीत ली जबकि शिवसेना को 63 सीटें मिली। अब ऐसे में शिवसेना को भाजपा की मौजूदगी अपने अस्तित्व के खतरे के रूप में भी नजर आने लगी।
भाजपा ने यहां की 288 सदस्यीय विधानसभा में से 122 सीटें जीत ली जबकि शिवसेना को 63 सीटें मिली। अब ऐसे में शिवसेना को भाजपा की मौजूदगी अपने अस्तित्व के खतरे के रूप में भी नजर आने लगी।
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Balasaheb, Uddhav Thackarey , Narendra modi
- फोटो : Collected from Social Media
साल 2014 में हुए आम चुनाव में भी बीजेपी ने शिवसेना के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा। भाजपा को 23 सीटें मिली थी, वहीं शिवसेना 18 सीटों पर जीती थी। भाजपा के इसी शानदार प्रदर्शन के बाद दोनों पार्टियों के रिश्ते में खटास आई। तब, शिवसेना आरोप लगाती थी कि भाजपा दादागिरी करना चाहती है।
उसी साल हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भाजपा गठबंधन करने के लिए 288 में से 144 सीटें चाहती थीं, मगर शिवसेना 119 से अधिक सीटें देने के लिए तैयार नहीं थी। दोनों पार्टियां अपने दम पर चुनाव में उतरी। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी, लेकिन जादुई आंकड़े से दूर ही थी।
ऐसे में शरद पवार की एनसीपी की मदद से देवेंद्र फडणवीस सूबे के मुखिया बने। शिवसेना कुछ दिनों तक विपक्ष में बैठी, लेकिन कुछ ही महीने बाद शिवसेना महाराष्ट्र की सत्ता में शामिल हुई। हालांकि दोनों के रिश्ते में खटास जारी रही।
उसी साल हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भाजपा गठबंधन करने के लिए 288 में से 144 सीटें चाहती थीं, मगर शिवसेना 119 से अधिक सीटें देने के लिए तैयार नहीं थी। दोनों पार्टियां अपने दम पर चुनाव में उतरी। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी, लेकिन जादुई आंकड़े से दूर ही थी।
ऐसे में शरद पवार की एनसीपी की मदद से देवेंद्र फडणवीस सूबे के मुखिया बने। शिवसेना कुछ दिनों तक विपक्ष में बैठी, लेकिन कुछ ही महीने बाद शिवसेना महाराष्ट्र की सत्ता में शामिल हुई। हालांकि दोनों के रिश्ते में खटास जारी रही।