अरुणाचल प्रदेश के आठवें मुख्यमंत्री कलिखो पुल ने मंगलवार को मुख्यमंत्री आवास में आत्महत्या कर ली। उनका शव सीएम आवास में ही पंखे से लटका मिला। उनकी मौत ने न केवल अरुणाचल बल्कि पूरे देश के सियासी गलियारों को सदमे में डाल दिया है। महज छह महीने तक अरुणाचल के मुख्यमंत्री रहे कलिखो लंबे समय से परेशान चल रहे थे। उनकी मौत के बाद सबके मन में एक ही सवाल उठ रहा है कि आखिर कलिखो कौन थे, और उनका राजनीतिक करियर कैसा रहा ? आईए तस्वीरों में जानते हैं कलिखो पुल के राजनीतिक जीवन के बारे में...
कालिखो पुल: डेढ़ रुपये में बढ़ई की नौकरी से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
कलिखो पुल अरुणाचल के आठवें मुख्यमंत्री थे जिन्होंने 19 फरवरी 2016 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन वह महज छह महीने तक ही अपने पद पर बने रह सके। 13 जुलाई 2016 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ गया था। इसकी वजह से वह काफी परेशान रहने लगे थे। लेकिन राजनीति में आने से पहले कलिखो का जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा।
कालिखो पुल: डेढ़ रुपये में बढ़ई की नौकरी से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
कलिखो 20 जनवरी 1969 को अरुणांचल प्रदेश के बढ़ई परिवार में पैदा हुए थे। कलिखो अरुणाचल के कमान मिशमी जातीय समूह से हैं। यह समूह भारत-चीन सीमा के दोनों तरफ पाया जाता है। ये जब 13 महीने के थे, तो इनकी मां चल बसीं। 5 साल की उम्र में इन्होंने अपने पिता को भी खो दिया। इनका बचपन बेहद गरीबी और अभाव में गुजरा।
कालिखो पुल: डेढ़ रुपये में बढ़ई की नौकरी से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
बचपन में कालिखो के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वह अच्छे स्कूल में पढ़ पाते। कलिखो ने बताया कि वे आंटी के घर में पले-बढ़े। जंगल से लकड़ी लेकर आते थे, तो एक वक्त का खाना मिलता था।' दस साल की उम्र में कालिखो ने बढ़ई का काम करना शुरु किया, इनका शुरुआती वेतन रोजाना डेढ़ रुपये था। इन्होंने रात में चौकीदार का भी काम किया।
कालिखो पुल: डेढ़ रुपये में बढ़ई की नौकरी से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
ग्यारह साल की उम्र में कालिखो को एक खतरनाक बीमारी ने चपेट में ले लिया। कलिखो ने इलाज के लिए कई रिश्तेदारों से मदद मांगी, पर कोई आगे नहीं आया। हारकर उन्होंने आत्महत्या का फैसला किया। वह आधे घंटे से भी ज्यादा नदी के पुल पर खड़े रहे, लेकिन लोगों की भीड़ होने के चलते सुसाइड नहीं कर सके। फिर वहां से गुजर रहे एक अफसर ने उन्हें सहारा दिया, इस हादसे के बाद कलिखो ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।