भारतीय राजनीति में नेताओं द्वारा अपने बेटों को चुनावी मैदान में उतारना और फिर अपनी विरासत उन्हें सौंपना कोई नई बात नहीं है। देश के सभी राज्यों में ऐसे नेताओं की बड़ी संख्या है। हालांकि देश में कई ऐसे शीर्ष नेता भी हैं, जिन्होंने परंपरागत सोच के विपरीत अपनी बेटियों को न केवल राजनीति के मैदान में उतारा, बल्कि अपनी विरासत का हकदार भी बनाया। आज हम देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव और शरद पवार जैसे उन नेताओं के बारे में बता रहे हैं, जिन्होंने बेटे और बेटियों के बीच समानता स्थापित की है।
बेटियों की कभी राजनीतिक विदाई नहीं होती, इंदिरा गांधी से सुप्रिया सुले तक
- इंदिरा गांधी से सुप्रिया सुले तक का सफर
- जवाहरलाल नेहरू से लेकर शरद पवार तक पुत्री मार्गदर्शन
- ऐसी बेटियां जिनको उनके पिता ने राजनीति के मैदान में उतारा
- जानिए ऐसे नेताओं के बारे में जिन्होंने अपनी बेटियों को विरासत का हकदार भी बनाया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पिता की इंदिरा प्रियदर्शिनी बन गई भारत की आयरन लेडी
इंदिरा गांधी में गहरी राजनीतिक दूरदर्शिता अपने पिता जवाहरलाल नेहरू के साथ रहने से आई थी। पिता जवाहर लाल नेहरू आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वालों में शामिल थे। 1919 का वही दौर था, जब जवाहरलाल नेहरू महात्मा गांधी के सानिध्य में आए थे। इंदिरा गांधी ने अपने पिता जवाहरलाल नेहरू से राजनीति का ककहरा सीखा।
बचपन में वो अपने पिता के साथ राजनीतिक बैठकों में शामिल हुआ करती थीं। जब वो पढ़ाई के लिए विदेश गईं तो खतों के जरिए अपने पिता के साथ जुड़ी रहीं। 1947 से 1964 तक इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्री पिता के साथ काम करना शुरू कर दिया और यहीं से इंदिरा को उनके पिता ने अपनी राजनीतिक विरासत सौंपनी शुरू कर दी। इंदिरा उनकी इकलौती संतान भी थी। इंदिरा में वह अपनी राजनीति का भविष्य देख रहे थे और मजबूत उत्तराधिकारी भी तय कर रहे थे।
1964 में जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया। उस समय इंदिरा टूट गईं और अकेली पड़ गईं। मगर 1966 में वह देश के सबसे ताकतवर पद पहुंच गईं। यानी प्रधानमंत्री बनीं और पिता से सीखे गुरों के आधार पर देश की बागडोर संभाली।
मुख्यमंत्री की बेटी होकर भी बस में करती थी सफर
अब बात करते हैं वर्तमान की। महाराष्ट्र की राजनीति में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानि एनसीपी और उसके अध्यक्ष शरद पवार का महत्वपूर्ण स्थान है। महाराष्ट्र के बारामती गांव से निकला युवक आगे चलकर चार बार राज्य का मुख्यमंत्री बना था। इसके बाद शरद पवार ने वरिष्ठ कांग्रेसी नेता पीए संगमा और तारिक अनवर के साथ मिलकर 25 मई 1999 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया था।
पवार का विवाह पूर्व क्रिकेटर सदू शिंदे की बेटी प्रतिभा पवार के साथ हुआ था। सुप्रिया सुले उनकी इकलौती संतान हैं और अभी महाराष्ट्र के बारामती से सांसद हैं। शरद पवार के राजनीतिक जीवन की छाप सुप्रिया सुले की कार्यशैली में साफ झलकती है। सुप्रिया सुले ने भी अपने पिता के मार्गदर्शन और छत्रछाया में राजनीति में उतरकर अलग पहचान बनाई। महाराष्ट्र की राजनीति में सुप्रिया की गिनती तेज तर्रार राजनेता के रूप में होती है। अपने पिता के सानिध्य में सुप्रिया को बचपन से ही राजनीति देखने समझने और सामाजिक कार्य करने का मौका मिला।
सुप्रिया: पत्रकार से सांसद तक का सफर
30 जून 1969 को पुणे में जन्मीं सुप्रिया पुणे के ही एक अखबार में काम करती थीं। वहां एक मित्र के माध्यम से उनकी मुलकात सदानंद सुले के साथ हुई, जो बालासाहब ठाकरे के भांजे हैं। सदानंद के साथ उनकी शादी हुई। दोनों को एक बेटा विजय और एक बेटी रेवती है। सुप्रिया पिछले दो बार से बारामती से सांसद हैं और यह लोकसभा सीट पवार परिवार का गढ़ मानी जाती है।
मुख्यमंत्री की बेटी सरकारी बस में करती थी सफर
कॉलेज लाइफ में सुप्रिया बहुत शर्मीले स्वभाव की थीं। उन्होंने पुणे के सेंट कोलंबस स्कूल से 12वीं तक की शिक्षा हासिल की और उसके बाद माइक्रो बायोलॉजी में बीएससी की। जिन दिनों वे कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं, तब उनके पिता शरद पवार, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। मुख्यमंत्री पिता की बेटी होने के बावजूद भी वह सरकारी बस से ही कॉलेज आया-जाया करती थीं।
शादी से पहले सुप्रिया के पति सदानंद सुले अमेरिका में नौकरी किया करते थे। शादी के बाद सुप्रिया भी अमेरिका गईं और वहां पर उन्होंने बर्कले यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा प्राप्त की। जल प्रदूषण पर उन्होंने एक रिसर्च पेपर भी लिखा। अमेरिका के बाद सिंगापुर और फिर कुछ समय जकार्ता में भी बिताया। कई देशों की यात्रा करने के बाद सुप्रिया सुले भारत लौट आईं और फिर अपने पिता के साथ राजनीति में सक्रिय हो गई।
सुप्रिया सुले की केंद्रीय राजनीति में एंट्री
2006 में सुप्रिया सुले की केंद्रीय राजनीति में एंट्री हुई। उसी साल वह पहली बार राज्यसभा की सदस्य बनीं। 2009 में वह पहली बार लोकसभा के लिए चुनी गईं। उन्होंने इस चुनाव में भाजपा की कांता नलवड़े को हराया था। दूसरी बार 2014 लोकसभा चुनाव में सुप्रिया फिर से जीत हासिल करके संसद पहुंची।
सुप्रिया पिता की ही तरह सामाजिक क्षेत्र में भी बहुत सक्रिय रहीं। राज्य स्तर पर उन्होंने भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान चलाया था। 2012 में उन्होंने 'राष्ट्रवादी युवती कांग्रेस' विंग भी बनाई, जिसका उद्देश्य युवा लड़कियों को राजनीति के लिए तैयार करना और उनको प्रशिक्षण देना था।
संसद में भी सुप्रिया सुले का प्रदर्शन
- संसद में उनकी उपस्थिति 96 फीसदी रही है। सुप्रिया ने अबतक करीब 142 बहस में भाग लिया और संसद में सक्रिय रहते हुए 1156 प्रश्न पूछे हैं।
- शरद पवार से एक बार पूछा गया था कि क्या पवार परिवार की तीसरी पीढ़ी यानी कि पार्थ और रोहित चुनाव लड़ेंगे?
- इस पर उन्होंने कहा था, “न तो पार्थ और न ही रोहित लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, यहां तक कि अजित पवार भी चुनाव नहीं लड़ेंगे।
- इस एक वाक्य से संदेश स्पष्ट हो गया था- शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले ही चुनाव लड़ेंगे। हालांकि बाद में अपने इस विचार से किनारा करते हुए उन्होंने कहा था कि परिवार के साथ विचार-विमर्श करने के बाद एक राय बनी कि अगली पीढ़ी को भी मौका दिया जाना चाहिए। हालिया राजनीतिक परिदृश्य में शरद पवार के उत्तराधिकारी के तौर पर सुप्रिया सुले को ही देखा जाता है।
मीसा आंदोलन की बेटी हैं
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, पीए संगमा और मुफ्ती मुहम्मद सईद ने भी अपनी बेटियों को राजनितिक में आगे बढ़ाया।
कभी बिहार की राजनीति के स्तंभ रहे और राजद की राजनीति के धुरी कहे जाने वाले लालू प्रसाद यादव के बुरे दिन शुरू हुए और वह जेल गए तो पार्टी और परिवार की जिम्मेदारी बेटों पर आई। लेकिन आम चुनाव से पहले दोनों भाइयों को जब साथ खड़े होकर विरोधियों से लड़ने की बारी आई, तो वे आपस में ही लड़ते दिखे। दोनों के बीच मनमुटाव और घर में चल रहे शीतयुद्ध के बीच बेटी मीसा भारती घर की मुखिया की भूमिका में खड़ी हुईं।
मीडिया के सामने भी वह पार्टी पर हो रहे हमलों को लेकर जवाब देती रहीं। यह कोई पहला मौका नहीं था, जब मीसा ने घर, परिवार और पार्टी को संभाला हो। दरअसल, बेटी का कद बढ़ाने में शुरू से ही पिता लालू की भूमिका रही। परिवार हो या राजनीति, बेटी मीसा को लालू ने अपने दोनों बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप से आगे रखा।
गोपालगंज से रायसीनाः मेरी राजनीतिक यात्रा’
लालू यादव की आत्मकथा, ‘गोपालगंज से रायसीनाः मेरी राजनीतिक यात्रा’ में उन्होंने बचपन से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक के अपने सफर के किस्से लिखे हैं। जब वह देश के रेल मंत्री थे, उस समय की सफलता और असफलता के बारें में भी लिखा है। किताब में लालू यादव ने अपने आप को महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की राजनीति को आगे बढ़ाने वाला बताया है। इस किताब में उन्होंने मीसा भारती का जिक्र भी किया है। लालू यादव के मुताबिक मीसा सिर्फ उनकी बेटी नहीं है, बल्कि आंदोलन की बेटी हैं।
लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की बड़ी बेटी मीसा भारती है। उनकी अहमियत पार्टी में उस दिन ज्यादा मजबूत हो गई जब 2014 में पाटलिपुत्र से मीसा की उम्मीदवारी तय की गई और इससे नाराज होकर रामकृपाल यादव जैसे पुराने और पारिवारिक नेता पार्टी छोड़कर चले गए।
बेटी का नाम मीसा रखने के पीछे का किस्सा
जब मीसा का जन्म हुआ था तब लालू यादव मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्यूरिटी एक्ट) के तहत जेल में थे इसलिए उनका नाम मीसा रखा गया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में पाटलिपुत्र से मीसा भारती के सामने भाजपा की ओर से चुनावी उम्मीदवार रामकृपाल यादव को कड़ी टक्कर दी थी। रामकृपाल यादव ने मीसा को 40322 वोटों से हराया था। मीसा को इस चुनाव में 342940 वोट मिले थे। मीसा हारीं जरूर थी, मगर उनका कद पार्टी में बड़ा हो गया। आज भी जब परिवार या पार्टी पर विरोधी हमला करते हैं तो करारा जवाब देने में मीसा मुखर रहती हैं।
जम्मू कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री
22 मई 1959 को जम्मू कश्मीर के अनंतनाग में जन्मीं महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई की है। वह जम्मू कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। जम्मू कश्मीर के बड़े नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती अपने तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं और यह एक बड़ी वजह भी मानी गई कि उन्हें पिता की विरासत मिली। महबूबा अपने भाई बहनों में सबसे ज्यादा अपने पिता के करीब रही और वही से उन्होंने अपनी राजनीति की पहली शिक्षा ली।
महबूबा मुफ्ती के नाम की चर्चा
महबूबा मुफ्ती का नाम पहली बार चर्चा में तब आया था, जब 1989 में उनकी छोटी बहन रुबैया सईद का अपहरण कर लिया गया था। उस वक्त उनके पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद को विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में गृहमंत्री बने मुश्किल से पांच दिन ही हुए थे। वह समय ऐसा था कि बस महबूबा ही मीडिया से लगातार रूबरू हो रही थीं और इस बारे में बात कर रही थी। 1996 में कांग्रेस के टिकट पर बिजबेहारा से जीत हासिल कर वह सबसे ज्यादा चर्चित चेहरा बन गई थीं। आज जम्मू कश्मीर की राजनीति में वह बड़ा नाम हैं।
मुफ्ती मोहम्मद सईद ने अपनी बेटी महबूबा मुफ्ती के साथ 1999 में अपनी राजनीतिक पार्टी पीपुल्प डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया, कदम कदम पर वो महबूबा मुफ्ती को राजनीति के बड़े दांव पेंच बताते चले गए।