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जमीन मुआवजा मामले में दो वकीलों को राहत: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई अंतरिम रोक, दिए ये निर्देश
Mon, 24 Aug 2026 10:23 PM IST
Devesh Tripathi
आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 24 Aug 2026 10:23 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण से जुड़े एक विवाद में दो वकीलों के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से शुरू की गई कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है। हाई कोर्ट ने आरोप लगाया था कि मुआवजे पर ब्याज का लाभ दिलाने के लिए अवॉर्ड की प्रति में कथित तौर पर बदलाव किया गया।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया आदेश पर रोक लगा दी। इस आदेश में दो वकीलों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का निर्देश दिया गया था, जिन पर आरोप था कि उन्होंने कोर्ट को गुमराह किया और जमीन अधिग्रहण से जुड़े एक अवॉर्ड की जाली कॉपी के जरिए अपने क्लाइंट्स के लिए राहत हासिल की।
जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने वकील शिव कांत मिश्रा की स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश दिया। इस एसएलपी में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 जुलाई के आदेश को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी पर नोटिस जारी किया और मामले को 12 अक्टूबर को लिस्ट करने का निर्देश दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिए थे क्या निर्देश?
इस बीच, जस्टिस मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने का भी निर्देश दिया, जिसे चुनौती दी गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया था कि वे वकील शिव कांत मिश्रा और कृष्ण कांत मिश्रा के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्यवाही शुरू करें। कोर्ट ने पाया कि उनका आचरण प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 199 के तहत अपराध था, जिसके लिए धारा 193 के तहत झूठी गवाही देने पर सजा का प्रावधान है।
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हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को यह भी निर्देश दिया था कि वे बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य बार काउंसिल के समक्ष शिकायतें दर्ज कराएं और दोनों वकीलों के लाइसेंस रद्द करने की मांग करें। यह कार्यवाही बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा अधिग्रहित भूमि के मुआवजे पर ब्याज के भुगतान से जुड़े विवाद के कारण शुरू हुई थी।
क्या है पूरा मामला?
अथॉरिटी द्वारा दायर समीक्षा याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि 26 अप्रैल, 2016 के अवार्ड की एक टाइप्ड कॉपी में एक अतिरिक्त बात जोड़ी गई थी। इसमें पहले साल के लिए 9 प्रतिशत और उसके बाद 15 प्रतिशत सालाना ब्याज का प्रावधान था, जो कथित तौर पर मूल अवार्ड में नहीं था।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की बेंच ने कहा कि टाइप्ड कॉपी एक दूसरी बेंच के सामने पेश की गई थी। उस बेंच ने 24 मई, 2024 को आदेश पारित करते समय उस कॉपी पर भरोसा किया था और अथॉरिटी को निर्देश दिया था कि वह जमीन मालिकों को जमीन का कब्जा छोड़ने की तारीख से लेकर अवार्ड की घोषणा तक का ब्याज दे।
धोखाधड़ी के बाद दायर हुई समीक्षा याचिका
हाईकोर्ट ने पाया कि बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को बाद में इस कथित धोखाधड़ी का पता चला और उसने समीक्षा याचिका दायर की। इसके बाद कोर्ट ने मूल अवार्ड और टाइप्ड कॉपी की जांच की। इस दलील को खारिज करते हुए कि यह अंतर केवल एक टाइपिंग की गलती थी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'टाइपिंग की गलती धोखेबाजी के कृत्य से अलग होती है।'
कोर्ट ने आगे कहा कि वकीलों को 9 प्रतिशत और 15 प्रतिशत ब्याज दरों के जोड़े जाने की जानकारी थी और उन्होंने अपने क्लाइंट्स को आर्थिक लाभ दिलाने के लिए यह बदलाव किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि कथित हरकत अनजाने में हुई गलती से कहीं ज्यादा गंभीर थी और इसे 'वकीलों की गलत हरकत' माना जाएगा। कोर्ट ने माफी की अपील भी ठुकरा दी और कहा कि इस हरकत के सामने आने के बाद मांगी गई माफी को सच्चा पछतावा नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तक लगाई कार्रवाई पर रोक
जस्टिस श्रीधरन की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि ऐसी हरकत को हल्के में लेने से बार (वकीलों के समुदाय) में गलत संदेश जाएगा कि 'चालाकी भरी हरकतें तब तक स्वीकार्य हैं जब तक वे पकड़ी न जाएं।' इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 मई, 2024 के अपने पहले के आदेश को रद्द कर दिया क्योंकि वह आदेश 'इस कोर्ट के साथ धोखाधड़ी करके' हासिल किया गया था। साथ ही, कोर्ट ने बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वे लाभार्थियों को पहले ही दी जा चुकी रकम की वसूली की प्रक्रिया शुरू करें।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि रजिस्ट्रार जनरल सीआरपीसी की धारा 340 के तहत जांच करें और उसके बाद कथित अपराध के संबंध में सक्षम मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज करें। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश ने अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें दो वकीलों के खिलाफ मिली जानकारी के आधार पर दिए गए निर्देश भी शामिल थे; मामले पर आगे विचार होने तक यह रोक लागू रहेगी।
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जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने वकील शिव कांत मिश्रा की स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश दिया। इस एसएलपी में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 जुलाई के आदेश को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी पर नोटिस जारी किया और मामले को 12 अक्टूबर को लिस्ट करने का निर्देश दिया।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिए थे क्या निर्देश?
इस बीच, जस्टिस मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने का भी निर्देश दिया, जिसे चुनौती दी गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया था कि वे वकील शिव कांत मिश्रा और कृष्ण कांत मिश्रा के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्यवाही शुरू करें। कोर्ट ने पाया कि उनका आचरण प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 199 के तहत अपराध था, जिसके लिए धारा 193 के तहत झूठी गवाही देने पर सजा का प्रावधान है।
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हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को यह भी निर्देश दिया था कि वे बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य बार काउंसिल के समक्ष शिकायतें दर्ज कराएं और दोनों वकीलों के लाइसेंस रद्द करने की मांग करें। यह कार्यवाही बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा अधिग्रहित भूमि के मुआवजे पर ब्याज के भुगतान से जुड़े विवाद के कारण शुरू हुई थी।
क्या है पूरा मामला?
अथॉरिटी द्वारा दायर समीक्षा याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि 26 अप्रैल, 2016 के अवार्ड की एक टाइप्ड कॉपी में एक अतिरिक्त बात जोड़ी गई थी। इसमें पहले साल के लिए 9 प्रतिशत और उसके बाद 15 प्रतिशत सालाना ब्याज का प्रावधान था, जो कथित तौर पर मूल अवार्ड में नहीं था।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की बेंच ने कहा कि टाइप्ड कॉपी एक दूसरी बेंच के सामने पेश की गई थी। उस बेंच ने 24 मई, 2024 को आदेश पारित करते समय उस कॉपी पर भरोसा किया था और अथॉरिटी को निर्देश दिया था कि वह जमीन मालिकों को जमीन का कब्जा छोड़ने की तारीख से लेकर अवार्ड की घोषणा तक का ब्याज दे।
धोखाधड़ी के बाद दायर हुई समीक्षा याचिका
हाईकोर्ट ने पाया कि बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को बाद में इस कथित धोखाधड़ी का पता चला और उसने समीक्षा याचिका दायर की। इसके बाद कोर्ट ने मूल अवार्ड और टाइप्ड कॉपी की जांच की। इस दलील को खारिज करते हुए कि यह अंतर केवल एक टाइपिंग की गलती थी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'टाइपिंग की गलती धोखेबाजी के कृत्य से अलग होती है।'
कोर्ट ने आगे कहा कि वकीलों को 9 प्रतिशत और 15 प्रतिशत ब्याज दरों के जोड़े जाने की जानकारी थी और उन्होंने अपने क्लाइंट्स को आर्थिक लाभ दिलाने के लिए यह बदलाव किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि कथित हरकत अनजाने में हुई गलती से कहीं ज्यादा गंभीर थी और इसे 'वकीलों की गलत हरकत' माना जाएगा। कोर्ट ने माफी की अपील भी ठुकरा दी और कहा कि इस हरकत के सामने आने के बाद मांगी गई माफी को सच्चा पछतावा नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तक लगाई कार्रवाई पर रोक
जस्टिस श्रीधरन की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि ऐसी हरकत को हल्के में लेने से बार (वकीलों के समुदाय) में गलत संदेश जाएगा कि 'चालाकी भरी हरकतें तब तक स्वीकार्य हैं जब तक वे पकड़ी न जाएं।' इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 मई, 2024 के अपने पहले के आदेश को रद्द कर दिया क्योंकि वह आदेश 'इस कोर्ट के साथ धोखाधड़ी करके' हासिल किया गया था। साथ ही, कोर्ट ने बरेली डेवलपमेंट अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वे लाभार्थियों को पहले ही दी जा चुकी रकम की वसूली की प्रक्रिया शुरू करें।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि रजिस्ट्रार जनरल सीआरपीसी की धारा 340 के तहत जांच करें और उसके बाद कथित अपराध के संबंध में सक्षम मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज करें। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश ने अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें दो वकीलों के खिलाफ मिली जानकारी के आधार पर दिए गए निर्देश भी शामिल थे; मामले पर आगे विचार होने तक यह रोक लागू रहेगी।