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बुंदेलखंड में संकट: भूख से कराह रहे सहरिया परिवार

Thu, 12 May 2016 04:39 AM IST
जितेंद्र तिवारी/अमर उजाला, सिलावन (ललितपुर)
जितेंद्र तिवारी/अमर उजाला, सिलावन (ललितपुर) Updated Thu, 12 May 2016 04:39 AM IST
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Bundelkhand crisis: Sahariya family in hunger.
- फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, सिलावन (ललितपुर)
सूखा क्या पड़ा, जैसे सहरिया परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। खेतों में कटाई कर उसमें गिरे-पड़े दानों को बीनकर और मेहनत-मजदूरी कर अपना जीवन-यापन करने वाला सहरिया समुदाय सूखे की जबरदस्त मार झेल रहा है। किसी ने खाने को दे दिया तो ठीक है, नहीं तो वह खाली पेट सोने को मजबूर हो जाते हैं। ग्राम पंचायत छपरट की सहरिया बस्ती के हालात यह हैं कि यहां के परिवारों को भूखे पेट सोना पड़ रहा है। विडंबना यह है कि इनके अपने बच्चों ने तो मुंह मोड़ ही लिया है, सरकार की तरफ से भी कोई सहायता नहीं मिल रही हैं। टूटे छप्परों के नीचे गुजर-बसर करने वाले और भूखे पेट सोने वाले इन परिवारों की ओर न तो सरकार का ध्यान जा रहा है और न ही समाजसेवियों का।
Bundelkhand crisis: Sahariya family in hunger.
मुन्नीबाई की टूटी- फूटी झोपड़ी - फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, सिलावन (ललितपुर)
ग्राम छपरट की सहरिया बस्ती में रहने वाली मुन्नी बाई पत्नी चिन्ना, मंजली बहू पत्नी गोपाल और हल्कू सहरिया की दास्तान सुनकर किसी का भी दिल भर सकता है। किसी ने पति की मृत्यु के बाद लड़की के घर का आसरा लिया, लेकिन लड़की भी घर छोड़कर निकल गई, उल्टे नातिन (पौत्री) का बोझ छोड़ गई। किसी के लड़के काम की तलाश में क्या गए, कई माह गुजर गए लेकिन अपनी बूढ़ी मां की सुध आज तक नहीं ली। किसी की पत्नी और लड़का अंधे हैं, उस पर भी लड़के को गले का कैंसर कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। इन हालातों में इन परिवारों को भूखे पेट सोने को मजबूर होना पड़ रहा है।
Bundelkhand crisis: Sahariya family in hunger.
हल्कू का परिवार - फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, सिलावन (ललितपुर)
ग्राम छपरट की सहरिया बस्ती में निवास करने वाले मिर्गी की बीमारी से ग्रसित हल्कू के परिवार में उसकी पत्नी और दो पुत्र हैं। पत्नी कामती और पुत्र भगवान दास आंखों से अंधे हैं। साथ ही पुत्र भगवान दास को गले का कैंसर और हल्कू की आंखों की रोशनी कम हो गई है। ऐसी स्थिति में दूसरे पुत्र ने अपने बूढ़े मां-बाप, अंधे व बीमार भाई को उनके हाल पर छोड़ दिया। हल्कू बताता है कि जब तक उसके हाथ-पैर चले, तब तक मजदूरी कर अपनी पत्नी और अंधे पुत्र का पेट भरते रहे, लेकिन अब मजदूरी उनके वश की नहीं रही। उसे गरीबी रेखा का कार्ड जारी किया गया है, जिस पर उसे पांच किलो चावल, 10 किलो गेहूं और दो किलो चीनी मिलती है, लेकिन इससे पूरे महीने का गुजारा नहीं होता। यदि किसी ने बचा खाना दे दिया तो पेट भर गया नहीं तो रात भगवान भरोसे गुजारना पड़ती है। इसके अलावा रहने के लिए कोई मकान भी नहीं है, उसे खुले आसमान में बरसाती डालकर गुजर- बसर करनी पड़ रही है।
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विधवा मुन्नीबाई और उसकी नातिन - फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, सिलावन (ललितपुर)
मुन्नीबाई उम्र (75 वर्ष) के पति चिन्ना की मृत्यु दस वर्ष पूर्व हो गई थी। उसकी तीन पुत्रियां पार्वती, कस्तूरी और केसर हैं। अपनी बाकी की जिंदगी गुजर- बसर करने के लिए मुन्नीबाई अपनी पुत्री कस्तूरी और दामाद के पास आ गई। लेकिन, सूखे के चलते दामाद की भी आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो गई, जिसके कारण दो वक्त की रोटी की जुगाड़ होना भी बंद हो गई। अब स्थिति यह है कि यह परिवार पेट भरने के लिए दूसरों के सहारे है। मुन्नी बाई बताती है कि उसकी एक अन्य पुत्री कहीं चली गई, जिसके चलते नातिन विनीता का बोझ भी उसके सर पर है। उम्र के इस पड़ाव में वह मजदूरी करने में असमर्थ है। ऐसी स्थिति में वह मांगकर अपना व नातिन का पेट भर रही है। वह बताती है कि किसी दिन खाना मिल जाता है और किसी दिन भूखे पेट ही सोना पड़ता है। उसे तीन सौ रुपए पेंशन मिलती है, जो गुजर- बसर करने के लिए नाकाफी है। इसके अलावा उसे सरकार से कोई मदद नहीं मिलती। कई बार अंत्योदय कार्ड बनवाने के लिए मांग की, लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। रहने के लिए मकान भी नहीं है।
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मंजली बहू - फोटो : मंजली बहू
80 वर्ष की उम्र पार कर चुकी मंजली बहू पत्नी गोपाल के दो पुत्र हैं। सूखा के कारण गांव में काम नहीं मिलने पर दोनों पुत्र पलायन कर गए। जब से पुत्र काम के लिए गए, तब से उन्होंने बूढ़ी मां की सुध नहीं ली। उनके चले जाने के बाद मंजली बहू को खाने के लाले पड़ गए। वह बताती है कि किसी घर खाने में कुछ बच गया तो दे दिया, नहीं तो भूखे रहकर ही समय गुजारना पड़ता है। सरकारी मदद के नाम पर मात्र तीन सौ रुपए पेंशन मिलती हैं। इसके अलावा न तो अंत्योदय कार्ड है और न ही मकान। ग्राम प्रधान मोहन सहरिया ने बताया कि हल्कू, मुन्नीबाई और मंजली बहू की स्थिति काफी खराब है। उनके यहां खाने के लाले पड़े हुए हैं। किसी ने खाने को दे दिया तो पेट भर गया, अन्यथा खाली पेट सोने को मजबूर होना पड़ता है। उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाए जाने का प्रयास किया जा रहा है।
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