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आजादी का अमृत महोत्सव : सादगी पसंद डॉ. राजेंद्र प्रसाद लेते थे सिर्फ आधी तनख्वाह

Sun, 02 Jan 2022 05:43 AM IST
योगेश साहू हरिश्चंद्र सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थली जीरादेई से लौटकर
हरिश्चंद्र सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थली जीरादेई से लौटकर Published by: योगेश साहू Updated Sun, 02 Jan 2022 05:43 AM IST
सार

देश को बनाने में जिन्होंने अपना जीवन दिया, उनकी विरासत और स्मृतियों से पाठकों को रूबरू कराने की कड़ी में पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, गोपीनाथ बारदोलोई, सर्वपल्ली राधाकृष्णन और वीर सावरकर के जन्मस्थान से रिपोर्टें पढ़ीं। आधुनिक भारत के शिल्पियों से जुड़े इन तीर्थस्थलों की गाथाओं की कड़ी में इस बार पेश है डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थली की कहानी...

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Azadi Ka Amrit Mahotsav : Dr Rajendra Prasad likes simplicity, used to take only half the salary, Independence
डॉ. राजेंद्र प्रसाद। - फोटो : Amar Ujala

पहले कार्यकाल में राष्ट्रपति का वेतन 10,000 रुपये हुआ करता था। राजेंद्र प्रसाद महज 5,000 रुपये ही बतौर वेतन लेते थे। अपने कार्यकाल के अंत में तो वे केवल 2,500 रुपये ही लेने लगे थे। वे, इतने सादगी पसंद थे कि अपने सारे काम स्वयं करते थे। अपने लिए, उन्होंने केवल एक सहायक रखा था। वे किसी तरह के तोहफे कुबूल नहीं करते थे।

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26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने जा रहा था, तैयारियां अपने शबाब पर थीं और इससे एक दिन पहले, मां समान उनकी बड़ी बहन भगवती देवी का निधन हो गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारतीय गणराज्य की स्थापना की रस्म पूरी की और फिर बहन के अंतिम संस्कार में शामिल हुए।

राजेंद्र बाबू मानते थे कि धर्मनिरपेक्षता का असली अर्थ, सभी धर्मों के प्रति बराबर और सार्वजनिक सम्मान प्रदर्शित करना है। सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन नास्तिक नहीं। दरअसल, नेहरू नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाएं।

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इसी पलंग पर शयन करते थे राजेंद्र बाबू। - फोटो : Amar Ujala
बेटे के मुखिया पद का प्रत्याशी बनने पर हुए थे नाराज
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दो बेटे थे, बड़े मृत्यंजय प्रसाद, छोटे धनंजय प्रसाद। आजाद भारत में पंचायत चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ होने के बाद, 1957 में पहली बार जीरादेई पंचायत के लिए चुनाव हुआ, जिसमें धनंजय प्रसाद मुखिया पद के लिए चुनाव में खड़े हो गए। उस दौर में हाथ उठाकर चुनाव होते थे, उस वक्त कुछ विवाद हो गया। नतीजा, चुनाव स्थगित हो गया। इसके कुछ समय बाद, राजेंद्र प्रसाद गांव आए तो उन्हें इसकी जानकारी मिली, इस पर वे धनंजय पर चुनाव में खड़े होने के लिए बहुत नाराज हुए।
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पैतृक आवास का मुख्य भवन, जिसकी टूट-फूट गई खपरैल तक भी ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ठीक नहीं करवा रहा। - फोटो : Amar Ujala
उद्घाटन की बाट जोह रही फोटो गैलरी
स्मारक की दुर्दशा देखकर, उसे पर्यटन योग्य बनाने के उद्देश्य से क्षेत्र के शिक्षाविद संजीव सिंह ने कुछ करना चाहा तो उनके पसीने छूट गए। आखिर में वे दिल्ली में डीजी एएसआई से मिले और उनसे मदद का अनुरोध किया। डीजी ने बजट की कमी बताते हुए हाथ खड़े कर दिए।

संजीव ने खुद पैसे खर्च करके एक फोटो गैलरी बनाने और कुछ पुनर्निर्माण का प्रस्ताव रखा। खैर, उसे हुज्जत के बाद मान लिया गया और अब एक भव्य फोटो गैलरी बनकर तैयार हो गई है। दो बार उद्घाटन की कोशिश हुई, मगर कोरोना लॉकडाउन के चलते कार्यक्रम नहीं हो सका।
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प्रतिमा के बगल में शाल लिए प्रो. तारा सिन्हा (राजेंद्र प्रसाद की पोती) व उनके ठीक बगल में काले जैकेट में अरुणोदय प्रकाश (पोता)। - फोटो : Amar Ujala
मेधावी छात्र, कई भाषाओं के ज्ञाता
  • डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बेहद मेधावी छात्र थे। घर की परंपरा के मुताबिक, उन्हें पांच वर्ष की उम्र में उर्दू के अध्ययन के लिए एक मौलवी को सौंप दिया गया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा छपरा (बिहार) के जिला स्कूल में हुई।
  • 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने, कोलकाता विवि की प्रवेश परीक्षा, प्रथम श्रेणी से पास करके दाखिला लिया था। 1915 में उन्होंने कानून में मास्टर डिग्री हासिल की और कानून में ही पीएच.डी. की डिग्री ली। तत्कालीन प्रेसीडेंसी कॉलेज में उनकी एग्जाम शीट देखकर, उनके एग्जामिनर ने कहा था कि 'द एक्जामिनी इज बेटर देन एग्जामिनर'।
  • डॉ. राजेंद्र प्रसाद, हिंदी, उर्दू, फारसी, संस्कृत, बांग्ला, गुजराती समेत 17 भाषाओं के अच्छे जानकार थे।
  • उनकी स्मरण शक्ति के कई किस्से हैं, उनमें से एक यह है कि 32 पेज के किसी दूसरे के लिखे एक भाषण की स्क्रिप्ट खो गई। इस स्क्रिप्ट को उन्होंने एक बार पढ़ा था, जरूरत पड़ने पर उन्होंने डिक्टेट करके उसे दोबारा लिखवा दिया। जब कुछ दिनों बाद उस भाषण की गुम हुई स्क्रिप्ट मिली तो उनके द्वारा डिक्टेट करके लिखवाए गए भाषण और मूल भाषण में एक अक्षर का भी फर्क नहीं मिला।
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राजेंद्र बाबू के आराध्य श्री कृष्ण की मूर्ति। - फोटो : Amar Ujala
पटना के सदाकत आश्रम में ली अंतिम सांस
पिता महादेव सहाय और मां कमलेश्वरी देवी के सुपुत्र डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1962 में राष्ट्रपति का पद स्वेच्छा से छोड़ दिया। 1962 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इसके कुछ ही दिनों बाद उनकी पत्नी राजवंशी देवी का निधन हो गया। वे पटना के सदाकत आश्रम आ गए। यहीं 28 फरवरी 1963 को 78 वर्ष की आयु में वे महाप्रयाण कर गए।

यह भी पढ़ें : आजादी का अमृत महोत्सव : राजेंद्र बाबू के 'संसार' को मसीहा का इंतजार, आखिर यह उपेक्षा क्यों?
 
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