1971 में रिलीज हुई सलीम-जावेद की पटकथा पर बनी फिल्म हाथी मेरे साथी के राजेश खन्ना सबको याद हैं, किसी को नहीं याद है तो बस ये कि इस फिल्म का निर्देशक कौन था? एम ए थिरुमुगम निर्देशित हाथी मेरे साथी में राजू को हाथियों से दोस्ती और फिर उसके प्यारे हाथी रामू की मौत का इंतकाम लेने की इस कहानी को दर्शकों ने खूब प्यार दिया। चक रसेल निर्देशित जंगली की भी कहानी यही है, बस यहां लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जैसा संगीत नहीं है और सलीम-जावेद जैसी पटकथा लिखने वाला कोई नहीं है।
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Movie Review: धमाकेदार एक्शन देखने वालों के लिए है विद्युत जामवाल की जंगली
Fri, 29 Mar 2019 12:52 PM IST
anand anand
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
Published by: anand anand
Updated Fri, 29 Mar 2019 12:52 PM IST
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Vidyut Jammwal
- फोटो : file photo
मूवी रिव्यू: जंगली
1971 में रिलीज हुई सलीम-जावेद की पटकथा पर बनी फिल्म हाथी मेरे साथी के राजेश खन्ना सबको याद हैं, किसी को नहीं याद है तो बस ये कि इस फिल्म का निर्देशक कौन था? एम ए थिरुमुगम निर्देशित हाथी मेरे साथी में राजू को हाथियों से दोस्ती और फिर उसके प्यारे हाथी रामू की मौत का इंतकाम लेने की इस कहानी को दर्शकों ने खूब प्यार दिया। चक रसेल निर्देशित जंगली की भी कहानी यही है, बस यहां लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जैसा संगीत नहीं है और सलीम-जावेद जैसी पटकथा लिखने वाला कोई नहीं है।
1971 में रिलीज हुई सलीम-जावेद की पटकथा पर बनी फिल्म हाथी मेरे साथी के राजेश खन्ना सबको याद हैं, किसी को नहीं याद है तो बस ये कि इस फिल्म का निर्देशक कौन था? एम ए थिरुमुगम निर्देशित हाथी मेरे साथी में राजू को हाथियों से दोस्ती और फिर उसके प्यारे हाथी रामू की मौत का इंतकाम लेने की इस कहानी को दर्शकों ने खूब प्यार दिया। चक रसेल निर्देशित जंगली की भी कहानी यही है, बस यहां लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जैसा संगीत नहीं है और सलीम-जावेद जैसी पटकथा लिखने वाला कोई नहीं है।
Vidyut Jammwal
- फोटो : social media
राजू अब राज बन चुका है और रामू का नया नाम है भोला। दोनों की बचपन की दोस्ती है। राज शहर से लौटा है जानवरों का डॉक्टर बनकर। यहां उसे फॉरेस्ट रेंजर देव मिलता है। महावत शंकरा मिलती है और मिलती है जर्नलिस्ट मीरा। जंगल की जिंदगी हसीन ही लगती है जब तक कि इस कहानी में हाथी दांत के तस्करों की एंट्री नहीं होती। इसके बाद फिल्म बदले की कहानी पर आगे बढ़ती है। सिहरा देने वाले एक्शन होते हैं। तलवारें, गोलियां चलती हैं। और, कहानी अपने अंजाम पर पहुंच जाती है।
junglee
फिल्म जंगली बच्चों के हिसाब से बनी है। बड़ों वाले तर्क यहां काम नहीं करते। देखने में टाइगर श्रॉफ के बड़े भाई जैसे लगते विद्युत जामवाल ने वह सब किया है जो बच्चों की तालियां पाने लायक है। फिल्म है भी पूरी तरह से विद्युत जामवाल की। परदे पर वह जमते हैं। हिंदी ही नहीं बल्कि किसी भी भारतीय भाषा के सिनेमा में विद्युत जैसा मार्शल एक्सपर्ट दूसरा नहीं मिलता। उलटी गुलाटी मारकर कार से बाहर आने का सीन हो या बाइक पर पीछे की तरफ गिरने का, विद्युत हर सीन में अपनी जान हथेली पर लिए दिखते हैं।
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junglee
- फोटो : file photo
बाकी कलाकारों में मकरदं देशपांडे गज गुरु के रूप में प्रभावित करते हैं। फिल्म की दोनों हीरोइनों में से किसी में भी हाथी मेरे साथी की तनुजा वाली बात नहीं है। शिकारी के तौर पर अतुल कुलकर्णी भी मिसकास्ट हैं। फिल्म के निर्देशक चक रसेल ने भी मेहनत काफी की है। मास्क, इरेजर और द स्कॉर्पियन किंग बना चुके रसेल वीडियो इफेक्ट्स के खिलाड़ी हैं। यहां काम उनको मानवीय संवेदनाओं पर ज्यादा करना था।
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विद्युत जामवाल
- फोटो : इंस्टाग्राम
विद्युत के एक्शन सीन्स के बाद फिल्म का दूसरा बड़ा प्लस प्वाइंट है इसकी सिनेमैटोग्राफी। मार्क इरविन और चक रसेल की जुगलबंदी कई हॉलीवुड फिल्मों में कमाल दिखा चुकी है। यहां भी मार्क का कैमरा कुदरत को इसके सबसे खूबसूरत रूप में पेश करता है। बधाई हो वाले अक्षत घिल्डियाल यहां लेखन टीम को लीड कर रहे हैं, उनसे एक बेहतर पटकथा की उम्मीद फिल्म में थी। अरसे से एक धमाकेदार एक्शन फिल्म की तलाश कर रहे हिंदी सिनेमा के दर्शकों के लिए जंगली बिल्कुल मुफीद फिल्म है। अमर उजाला डॉट कॉम के मूवी रिव्यू में फिल्म जंगली को मिलते हैं तीन स्टार।