कलाकार: माधुरी दीक्षित, आलिया भट्ट, सोनाक्षी सिन्हा, वरुण धवन, आदित्य रॉय कपूर, संजय दत्त और कुणाल खेमू।
निर्देशक: अभिषेक वर्मन
निर्माता: करण जौहर, साजिद नाडियाडवाला, फॉक्स स्टार स्टूडियोज
रेटिंग: *
विरासत में प्रोडक्शन हाउस पाने वाले करण जौहर जब तक संयमित फिल्ममेकर रहे, उन्होंने हिंदी सिनेमा में कमाल किए हैं। लेकिन, अब वह बिजनेसमैन हैं। और, बिजनेसमैन भी ऐसा जो अपनी ही फिल्मों को ढंग के प्रमोशन तक का वक्त नहीं दे रहा।
मार्च में केसरी, अप्रैल में कलंक और मई में स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2। केसरी बहुत खींचतान कर भी सुपरहिट फिल्म का तमगा नहीं पा सकी और कलंक धर्मा प्रोडक्शंस की सबसे खराब फिल्म के कलंक के तौर पर याद की जाएगी। यशराज फिल्म्स की ठग्स ऑफ हिंदोस्तां से भी गई बीती है करण जौहर की ये फिल्म कलंक।
फिल्म कलंक की पूरी कहानी काली है। एक बड़े घराने की बहू मरने वाली है। मरने से पहले वह अपने पति के लिए दूसरी पत्नी तलाश लाती है। लेकिन, रिश्ते यहां कर्ज बन जाते हैं। एहसान के बोझ तले दबी जबर्दस्ती की बीवी को पड़ोस में आशिक मिल जाता है। वह जबर्दस्ती कोठे पर गाना सीखने भी जाने लगती है। देश में बंटवारे का बिगुल बज चुका है। फिरकापरस्त लोग वन नेशन की थ्योरी मानने को तैयार नहीं हैं। दंगा होता है। बवाल मचता है। और, फिल्म दो घंटे 48 मिनट तक आपको बोर करके ही मानती है।
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माधुरी दीक्षित
- फोटो : मुंबई ब्यूरो
कलंक ने दो बातें सही साबित की हैं। पहली तो ये कि किसी फिल्म के पोस्टर और ट्रेलर से ही अब दर्शक फिल्म को देखने और न देखने का मन बना लेते हैं। और दूसरी ये कि फिल्में अब सुपरस्टार्स से नहीं चलतीं। कहानी ही अब असली सुपरस्टार है। कलंक यहीं सबसे ज्यादा मात खाती है। फिल्म की न तो कहानी में दम है और न ही पटकथा में। हिचकोले खाती कहानी किरदारों को भी ढंग से नहीं गढ़ती है। इतिहास को सही ढंग से पेश न कर पाने वाली अभिषेक वर्मन की फिल्म कलंक का दूसरा कलंक ये भी है कि इसका भूगोल गड़बड़ाया हुआ है।
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बॉलीवुड
- फोटो : Amar Ujala
माधुरी दीक्षित को इस बात का अफसोस रहेगा कि इतनी शानदार अदाकारी के बावजूद कलंक का बॉक्स ऑफिस हश्र अच्छा नहीं होने जा रहा। उनके परदे पर आने से बहार आती है। रूप का लावण्य भी इसी बहार में निखरता है। जफर की जान भी इसी बहार में अटकी है और बलराज का बल भी। माधुरी के बाद आलिया का काम नंबर दो पर है। नंबर तीन पर गिनती के लायक बाकी कलाकारों में से अगर किसी का नाम बचता है तो वह हैं कुणाल खेमू। अच्छे खलनायकों की तलाश में भटक रहे हिंदी सिनेमा को उनमें एक अच्छा कलाकार दिखा है।
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Kalank
- फोटो : amar ujala
वरुण धवन कहीं से 1945 के नौजवान नहीं लगते। उनका सिक्स पैक इस फिल्म में उनका पैकअप कर गया। उनका नाचना भी नकली दिखता है और उनकी बुल फाइटिंग भी। संजय दत्त के चेहरे पर अब अदाकारी का तेज नहीं मजबूरी दिखती है। सोनाक्षी और आदित्य रॉय कपूर भी बस भरती के लिए हैं।