निर्माताः सरोज एंटरटेनमेंट प्रा.लि.
कुछ घटनाओं की गूंज इतिहास में दर्ज हो जाती है। छह दिसंबर 1992 ऐसी ही तारीख है। 25 बरस में ऐसा कोई दिन शायद ही गुजरा हो जब इस पर राजनीति के गलियारों से लेकर मोहल्लों के चौक-चौबारों पर चर्चा न हुई हो। अयोध्या प्रकरण की कुछ बातें पत्थर की लकीर-सी हैं और कुछ मिथक-सी बनती-बिगड़तीं रेखाएं।
Film Review: एक प्रेम कहानी...कुछ हिंदू-मुस्लिम मतलब 'गेम ऑफ अयोध्या'
निर्माता-निर्देशक सुनील सिंह ने 1992 की अयोध्या के संपूर्ण घटनाक्रम को ऐतिहासिक क्रम में पिरोते हुए उसकी परत-दर-परत व्याख्या का प्रयास किया है। उन्होंने इसके स्याह-सफेद को अपने अंदाज में कहने/दिखाने की कोशिश की। कैसे एक युवा पत्रकार तथ्यों की गलत रिपोर्टिंग करता है मगर उसके मन में टीस बनी रहती है।
वक्त बीतने के साथ जब वह परिपक्व होता है तो गलती को सुधारना चाहता है। वह अब किताब की शक्ल में तथ्यों का सच्चा ताना-बाना बुनता है। 'गेम ऑफ अयोध्या' लाइब्रेरी में बैठे चार-पांच लोगों के विचार-विमर्श के बीच कहानी से अधिक डॉक्यूमेंट्री लगती है।
फिल्मकार ने लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट को संवादों का आधार बनाया। कई राजनीतिक चेहरों को कठघरे में खड़ा किया। फिल्म में उस वक्त के नेताओं के भाषणों के वास्तविक फुटेज हैं। फिल्म में एक प्रेम कहानी है और कुछ हिंदू-मुस्लिम किरदार। गंभीर परिस्थितियों के बावजूद कथानक और संवाद असर नहीं छोड़ते।
अभिनेता किसी खास मिशन पर निकले मालूम पड़ते हैं। कुछ जगहों पर फिल्म ठेठ वृत्तचित्र-सा आभास देती है। साफ लगता है कि फिल्मकार की मंशा कहानी कहने से अधिक कुछ पर्दाफाश करने सरीखी है। क्या वह खुद कोई गेम कर रहा है? पटकथा और तकनीकी दृष्टि से भी गेम ऑफ अयोध्या कतई प्रभावित नहीं करती।