Movie Review: कुली नंबर वन
पटकथा: रूमी जाफरी संवाद: फरहाद सामजी
कलाकार: वरुण धवन, सारा अली खान, परेश रावल, राजपाल यादव और जावेद जाफरी आदि।
निर्देशक: डेविड धवन
रेटिंग: *1/2
ये उन दिनों की बात है जब वाशू भगनानी का ऑफिस जुहू में सी प्रिंसेंस होटल के सामने वाली गली में एक दुछत्ती में हुआ करता था, डेविड धवन रोज शाम को वहां गप्पे मारने आते। दोनों के बीच गजब का दोस्ताना हुआ करता और दोनों को पता होता कि बाहर सड़क पर हो क्या रहा है! अब वाशू का ऑफिस मुंबई में जेडबल्यू मैरियट के सामने की बहुमंजिली इमारत में है। इमारत उनकी अपनी है। 25 साल पहले वह टिप्स म्यूजिक कंपनी के एक वेंडर थे और आज उनका अपना टर्न ओवर टिप्स से कहीं ज्यादा है। वह अंतरराष्ट्रीय बिल्डर हैं। एनआरआई हैं। कोरोना काल में पूरी की पूरी फिल्म ब्रिटेन में शूट कर डालने का माद्दा रखते हैं। बस, 25 साल पहले वाला हिंदी सिनेमा का दर्शक अब उनके भीतर से निकल चुका है। उनका जनता से कनेक्शन टूट चुका है। वह अब सिनेमा नहीं प्रोजेक्ट बनाते हैं और अपनी इमारतों के फ्लैट्स की तरह उन्हें बेच भी देते हैं।
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कुली नंबर 1
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
‘कुली नंबर वन’ हिंदी सिनेमा का पिछले 25 साल का सच है। गोविंदा की उस फिल्म का रिव्यू लिखने वाले मेरे जैसे गिनती के लोग ही वरुण धवन की इस फिल्म का भी रिव्यू लिख रहे होंगे। इन पच्चीस साल में सिनेमा प्रोजेक्ट में तब्दील हो गया। ‘कुली नंबर वन’ की रीमेक के पोस्टर पर लिखा ‘डेविड धवन की 45वीं फिल्म’ सिर्फ एक जुमला बनकर रह गया है। 1993 में प्रभु और सुकन्या की जिस तमिल फिल्म ‘चिन्ना मपिल्लाई’ का वाशू ने गोविंदा के साथ 1995 में रीमेक बनाया ‘कुली नंबर वन’ के नाम से, अब उसी का फ्रेम बाई फ्रेम रीमेक उन्होंने वरुण धवन के साथ बना दिया है। बस कुली का ठिकाना बदल गया है और उसका बोलने बतियाने का स्टाइल भी बदल गया है। लेकिन, न तो यहां गोविंदा की टाइमिंग है, न करिश्मा का अल्हड़पन है, न कादर खान का करिश्मा है, न शक्ति कपूर की शरारतें हैं और तो और गाने तक बर्दाश्त करने लायक नहीं है।
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कुली नंबर 1
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
एक तरह से देखा जाए तो हिंदी सिनेमा का ये शुद्धिकरण काल है। रीमेक के नाम पर दर्शकों को बुद्धू बनाने की सारी चालें नाकाम हो रही हैं। पहले ‘लक्ष्मी’, फिर ‘दुर्गामती’ और अब ‘कुली नंबर वन’। तीनों रीमेक, तीनों खराब सिनेमा के उदाहरण। गोविंदा वाली ‘कुली नंबर वन’ इसलिए लोगों को पसंद आई क्योंकि वहां अमीरी और गरीबी की लड़ाई असली दिखती थी। यहां अमीर भी नकली लगते हैं और गरीब तो किसी कोने से गरीब दिखता ही नहीं। इतनी कड़क वर्दी कुली की कौन पहनता है भाई किसी रेलवे स्टेशन पर?
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कुली नंबर 1
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वाशू और डेविड ने आखिरी बार किसी ट्रेन से हिंदुस्तान के अंदर सफर कब किया होगा, पता नहीं। कम से कम उनकी राइटिंग टीम ने तो बरसों से नहीं ही किया, नहीं तो पिछले 25 साल का रेलवे का कुछ तो बदलाव फिल्म में दिखता। अमीरी का पतंग यहां पूरी की पूरी सद्दी पर उड़ी जा रही है, जो मन में आ रहा है राइटर फेंकता जा रहा है। ये भी नहीं दिख रहा है कि इससे वह अपने ही कैरेक्टर्स को कार्टून बना रहा है। हीरो भी हीरोगिरी क्या स्टैंडअप कॉमेडी तक नहीं कर पा रहा। मिमिक्री भी बेअसर है। कहानी वही की वही है। एक अमीर का एक मैचमैकर को बेइज्जत कर घर से निकालना और उस मैचमेकर का एक कुली को इस रईस का दामाद बनाकर इस बेइज्जती का बदला लेने का प्लान बनाना।
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कुली नंबर 1
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘कुली नंबर वन’ सबसे पहले तो समय में पीछे छूट चुकी कहानी है। बदलते माहौल में नई सदी की दिक्कतों और ‘इन्डीड’ पर नौकरी ढूंढती पीढ़ी की तमन्नाओँ को ध्यान में रखकर इसका रीमेक बनता तो शायद डेविड धवन अपने कानपुर वाले दिन भी कुछ न कुछ जरूर इसमें डाल पाते। लेकिन, इतना खराब निर्देशन डेविड ने पहली बार नहीं किया है। इस तरह के ‘कमाल’ वह अपने करियर में पहले भी कर चुके हैं। लेकिन, इस बार पनौती उनके अपने बेटे को लग गई है।