Movie Review: कम प्ले
कलाकार: एजी रॉबर्टसन, गिलियन जैकब्स, जॉन गैलागर जूनियर, विंस्लो फेगले
लेखक-निर्देशक: जैकब चेज
निर्माता: रिलायंस एंटरटेनमेंट, एंबलिन पार्टनर्स, द पिक्चर कंपनी
रेटिंग: ***
छोटी अवधि की फिल्मों को लेकर दर्शकों में जागने वाली उत्सुकता को देखते हुए तमाम शॉर्ट फिल्में बड़े पर्दे की भरी पूरी कहानियां बन चुकी हैं। ऐसी ही एक चर्चित लघु फिल्म रही है, लैरी। लैरी दरअसल एक ऐसा जीव है जिसे दूसरे तो क्या वह खुद नहीं समझ पाता कि वो क्या है। उसे बस किसी का साथ चाहिए। भरी दुनिया में दिल को समझाने वह कहीं जाना चाहता है, लेकिन कहां और कैसे, इसे लेकर शंका है। जहां वह जाता है, वहां लोग उससे डरते हैं। और, वह कैसे जाता है, इसी बात पर फिल्म ‘कम प्ले’ का पूरा वीभत्स रस टिका है।
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कम प्ले
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
भय का भाव जगाने वाली फिल्म ‘कम प्ले’ में अगर आप कोई नई बात तलाशने निकलेंगे तो शायद आपको निराशा हाथ लगे लेकिन इसे सिर्फ एक और हॉरर फिल्म समझकर देखने बैठेंगे तो ये वीकएंड का एक अच्छा टाइम पास है। फिल्म के निर्देशक जैकब चेज की ये पहली फीचर फिल्म है लेकिन पहली ही फिल्म में दर्शकों में भय जगाने के लिए उन्होंने जिस तरह कठपुतलियों का इस्तेमाल करके ‘भूत’ बनाया है वह तारीफ के काबिल है। बतौर निर्देशक उनको फिल्म के कलाकारों का भी उम्दा साथ मिला है।
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- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘कम प्ले’ कहानी है एक खास बच्चे ओलीवर की। वह लोगों से संवाद बनाने के लिए अपने मोबाइल पर एक एप की मदद लेता है। उसके अभिभावकों की आपस में पटती नहीं। अपनी मां को वह अपने आसपास की सारी चीजें बताता है। लेकिन, मां तो मां ठहरी, हिंदुस्तान की हो या हॉलीवुड की, उसका पहला काम दिलासा देना ही है। उसका बच्चा सबके निशाने पर है। दोस्त उसके बनते नहीं है। चिढ़ाने वाले दुश्मन ज्यादा है। तभी, कोई है जो उसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाता है। वह ओलीवर के साथ तमाम उम्र भी बिताना चाहता है। बस, वह इस दुनिया का नहीं है।
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- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दुनिया चांद से आगे मंगल तक पहुंच रही है तो भूतों की परछाइयां भी अब शीशों से निकलकर हमारे हाथों में चौबीसों घंटे रहने वाले गैजेट्स में पहुंच रही हैं। फिल्म की शुरूआत में ही जब मोबाइल पर खेल रहे ओलीवर को दो आंखें स्क्रीन के पीछे से देखना शुरू करती हैं तो सिहरन सी होती है। लैरी को लगातार और लंबे समय तक स्क्रीन पर मौजूद न रखकर जैकब ने ये सिहरन फिल्म के आखिर तक बरकरार भी रखी है। फिल्म की कथा वस्तु बिल्कुल अनोखी तो नहीं है क्योंकि मोबाइल वाला भूत तो हिंदी सिनेमा तक पहले ही पहुंच चुका है। लेकिन, जैकब की जीत इस फिल्म में इस वजह से है कि वह हॉरर को ज्यादा उभारने की बजाय कहानी को स्थाई करने पर मेहनत करते हैं। हालांकि, यही फिल्म की बाद में कमजोरी भी बनती दिखने लगती है।
अगर आपने छह साल पहले आई फिल्म ‘द बाबादूक’ देख रखी है तो हो सकता है कि ‘कम प्ले’ आपको उतना आकर्षित न करे या फिर उतना डरा न सके। लेकिन, फिल्म की सच्चाई इस तथ्य में है कि यहां ये फिल्म एक माहौल बना रही है। अकेलेपन में हो सकने वाले हादसों के लिए। कोई क्यूं अकेले में आनंद लेने लगता है, इसीलिए ना कि दुनिया उसे झूठी लगने लगती है, और ऐसे में किसी दूसरी दुनिया का वैसा ही कोई अकेला अगर साथ देने आ जाए तो फिर? सवाल सोच का है। हॉरर फिल्म में एक सामाजिक अनुभूति के सहारे आगे बढ़ने की ये कोशिश ही दाद देने वाली है।