1987 में राष्ट्रीय एकता अभियान के लिए बनाए गीत 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' से प्रसिद्धि पाने वाले करामाती ऐड गुरु पियूष पाण्डेय विज्ञापन एजेंसी ओगिल्वी के चीफ क्रिएटिव ऑफिसर हैं। इन्होंने 'हर घर कुछ कहता है', 'गुगली वूगली वूस' जैसी कई पंचलाइनें रची हैं। 'अबकी बार मोदी सरकार' जैसी दुनिया की सबसे सफल कैंपेन बनाने में भी पियूष पाण्डेय की ही कल्पना शक्ति का कमाल रहा। पियूष की कॉरपोरेट दुनिया में एक पहचान ये भी है कि वह 41 साल से एक ही कंपनी में नौकरी कर रहे हैं और इसका राज भी वह इस इंटरव्यू में खासतौर से खोल रहे हैं।
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अमिताभ बच्चन
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
एक आम इंसान से ऐडमैन बनने तक का सफर कैसा रहा?
मैं अब भी एक आम इंसान ही हूं। अगर आप चाहते हैं कि लोगों तक आपका काम पहुंचे और लोग आपकी भावनाएं समझ पाएं तो आपको आम इंसान बने रहना पड़ेगा। मुझे लगता है आप जहां भी हैं वहां आप खुद नहीं पहुंचे हैं बल्कि जनता ने पहुंचाया है। और वह इसलिए क्योंकि उनको आपका काम पसंद है। जो आदमी यह सोचने लगता है कि मैंने ये कर दिया, वह कर दिया तो फिर उस आदमी के पतन की शुरुआत होने लगती है। मेरा मानना है कि अगर आप लोगों को समझेंगे, उनके विचारों को समझेंगे तो उनके मन में क्या है, वह भी समझ में आने लगता है और चीजें आसान हो जाती हैं। आज 41 साल बाद भी मैंने खुद को लोगों से जोड़कर रखा है, शायद यही वजह है यहां पहुंचने की।
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पियूष पाण्डेय
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
विज्ञापन आपके जीवन में कब और कैसे आया?
मैं कोलकाता में टी टेस्टर (Tea Taster) की नौकरी कर रहा था। मेरे कॉलेज के कुछ लड़के विज्ञापन करते थे। उनको देख कर मेरे मन में भी इसकी जिज्ञासा हुई। बातचीत शुरू हुई तो हमारी मंडली के अरुण लाल ने समझाया, ‘ऐड में जैसे लिखा जाता है वैसे तो तू रोज कुछ ना कुछ बोलता रहता है। तू ऐड में जाने की कोशिश क्यों नहीं करता है?’ अरुण लाल को तो आप सब जानते ही हैं कि क्रिकेट में उन्होंने कितना नाम कमाया।
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पियूष पाण्डेय
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
तो फिर कोलकाता से मुंबई...
हां, तब मैंने फैसला किया कि मैं ऐसी जगह जाऊंगा जहां इसको अच्छी तरह से सिखाया जाता है। ज्यादातर अच्छे विज्ञापन मुंबई में बनते थे। मैं कोलकाता से मुंबई आ गया और मेरी किस्मत अच्छी थी कि यहां मेरी बहन इला अरुण के पास घर था। उन्होंने मुझे अपने घर रहने की जगह नहीं दी होती तो मुंबई में रहना बहुत मुश्किल हो जाता। थोड़े समय बाद मुझे ओगिल्वी में नौकरी मिल गई। आज 41 साल हो गए है मुझे ओगिल्वी में और अभी तक का सफर अच्छा ही रहा।
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पियूष पाण्डेय
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इस नौकरी के लिए दिया गया इंटरव्यू याद है आपको?
पहले तो मना ही कर दिया था कि कुछ पूछना बताना हो तो ठीक है पर नौकरी नहीं है हमारे पास। यहां एक बात कहना चाहता हूं। किसी भी नौकरी के आवेदन का पहला संवाद आपका बायोडाटा होता है। अगर उसे ढंग से बना लिया और ढंग से भेज दिया तो उसका असर होता है। मेरा भी बायोडाटा देखा गया। मैंने रणजी ट्रॉफी तक क्रिकेट खेला, सेंट स्टीफेंस कॉलेज से एमए फर्स्ट डिवीजन पास किया। इंटरव्यू लेने वाले को इसने प्रभावित किया। मुझे रुकने को कहा गया। वह अपने एमडी से मिलकर आए और मुझे अगले दिन फिर आने को कहा गया।