Movie Review: पागलपंती
कलाकार: जॉन अब्राहम, अरशद वारसी, पुलकित सम्राट, अनिल कपूर, इलियाना डी क्रूज, कृति खरबंदा, सौरभ शुक्ला आदि।
निर्देशक: अनीस बज्मी
निर्माता: भूषण कुमार, कुमार मंगत आदि।
'प्रेम कहानी में एक लड़का होता है, एक लड़की होती है, कभी दोनों हंसते हैं, कभी दोनों रोते हैं', राजेश खन्ना और मुमताज पर फिल्माए गए फिल्म प्रेम कहानी के इस गाने में आनंद बक्षी ने बहुत सादगी के साथ एक फिल्म की पूरी कहानी दो लाइनों में बयां कर दी है। सादगी अब हिंदी सिनेमा में ईद का चांद हो चुकी है। और, इसी के साथ गायब हो चुकी हैं ऐसी कहानियां जिन्हें बिना किसी सिरदर्द के आसानी से समझा जा सके। अफसोस इस बात का भी होता है कि दूसरे निर्देशकों के लिए दमदार पटकथाएं लिखने वाले लेखक अनीस बज्मी भी पागलपंती जैसी फिल्म बना सकते हैं। इस फिल्म को देखने का मन बनाना सबसे बड़ी पागलपंती है।
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पागलपंती
- फोटो : सोशल मीडिया
मराठी सिनेमा में दादा कोंडके से शुरू हुआ भोंडी कॉमेडी का रायता अब पूरे हिंदी सिनेमा में फैल चुका है। हाउसफुल 4 जैसी फिल्में भी जब दो सौ करोड़ का कारोबार कर ले जाती हों तो जाहिर है निर्माताओं को कायदे से जमे दही में दिलचस्पी होगी भी नहीं। सिनेमा समाज का प्रतिबिम्ब कहा जाता है। और, यह बिम्ब प्रतिबिम्ब फिलहाल रायते का ही चल रहा है। यकीन न हो तो नीरज मोदी से पूछ लीजिए। जी हां, देश वालों की गाढ़ी कमाई का पैसा बैंकों के रास्ते लूटकर भागे कारोबारी की पनाह मांगने की असली कहानी इस फिल्म कहानी से ज्यादा मनोरंजक है।
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पागलपंती
- फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म पागलपंती की कहानी राजीव कौल और प्रफुल्ल पारेख के साथ मिलकर अनीस बज्मी ने लिखी है। तीनों लेखकों ने लगता है कहानी में अपने अपने किरदार सेट कर लिए और ये भूल गए कि इस पर एक फिल्म बननी है जिसे दर्शकों ने पैसे खर्च करके देखना भी है। तीन तिलंगे हैं। विदेश में कारोबार खड़ा करते हैं लेकिन मामला फुस्स हो जाता है। दो भाई टाइप के लोगों के यहां काम पर लगते हैं और एंट्री हो जाती है नीरज मोदी की। हिंदी सिनेमा में कॉमेडी फिल्मों में कॉमेडी का लौट पाना कुछ कुछ नीरव मोदी के भारत लौटना जैसा ही हो चला है। पहला भारत नहीं आ रहा। कॉमेडी फिल्में लोगों को हंसा नहीं रहीं।
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पागलपंती
- फोटो : सोशल मीडिया
तो गड़बड़ी कहां है? कॉमेडी करने के लिए जिस तरह की अदाकारी और टाइमिंग की जरूरत होती है, वहां इस फिल्म में सिर्फ अरशद वारसी और सौरभ शुक्ला में दिखाई देती है। और, दिक्कत ये है कि दोनों का स्क्रीन टाइम इतना है नहीं कि सिर्फ इन दोनों के चक्कर में फिल्म देखी जा सके। जॉन अब्राहम बिना ज्यादा बोले और बिना ज्यादा हाथ पैर चलाए सत्यमेव जयते, पोखरन और मद्रास कैफे जैसी फिल्मों में ही ठीक हैं। अक्षय कुमार के साथ तो वह कॉमेडी में चल भी जाते हैं, लेकिन मेन लीड में कॉमेडी करना आसान नहीं है।
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Pagalpanti Trailer Review
- फोटो : Amar Ujala, Mumbai
अनीस बज्मी ने फिल्म में हीरोइनों की भी लाइन लगा दी है। इलियाना डी क्रूज ने फिर भी अपने हिस्से के काम में अपनी पहचान जता भी दी लेकिन कृति खरबंदा एक रईस बाप की बिगडैल बेटी के किरदार में मिसफिट नजर आती हैं। और, उर्वशी रौतेला फिल्म में क्यों है, ये या तो अनीस बज्मी बता सकते हैं या फिर खुद उर्वशी रौतेला। कहानी में किसी सजावटी सामान से ज्यादा तवज्जो उनके किरदार को फिल्म में नहीं मिली है। फिल्म पागलपंती उन फिल्मों में से है जिनमें किसी निर्देशक को कहानी से पहले फिल्म में काम करने के लिए कलाकार मिल जाते हैं, कहानी शूटिंग शुरू होने के बाद भी बनती रहती है। अमर उजाला मूवी रिव्यू में फिल्म पागलपंती को मिलते हैं डेढ़ स्टार।