ऑस्कर विजेता फिल्म निर्माता गुनीत मोंगा कपूर की अगली फिल्म ‘किकिंग बॉल्स’ सीधे उस मुद्दे पर चोट करती है, जिसके नीचे राजस्थान की तमाम बच्चियों के अरमान दम तोड़ते रहे हैं। बाल विवाह प्रथा को उजागर करने वाली ये डॉक्यूमेंट्री फिल्म गुनीत मोंगा हाल ही में भारत के लिए भी घोषित किए गए शी लीड इम्पैक्ट फंड से आर्थिक सहयोग पाएगी और इसके लिए गुनीत ने एक और फिल्म निर्माता अश्विनी यार्डी से हाथ मिलाया है।
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किकिंग बॉल्स
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘किकिंग बॉल्स’ बाल विवाह के इस सदियों पुराने मुद्दे को सामने लाती है। यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म राजस्थान के उन तीन गांवों की पड़ताल करती है जहां एक एनजीओ फुटबॉल के माध्यम से बाल विवाह की कुप्रथा के विरुद्ध जागृति पैदा कर रहा है। फिल्म की एक विशेष स्क्रीनिंग हाल ही में राजधानी दिल्ली में आयोजित की गई।
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अजैता शाह, गुनीत मोंगा कपूर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
शी लीड्स इम्पैक्ट फंड की ये कोशिश बाल विवाह को समाप्त करने और ग्रामीण घरों में विवाहित लड़कियों का समर्थन करने के लिए समर्पित है। इस फिल्म का उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन लाने और कम उम्र में विवाह के चक्र में फंसी युवा लड़कियों को सशक्त बनाने का है। बाल विवाह को समाप्त करने और प्रभावित लड़कियों को सशक्त बनाने के मिशन का समर्थन करने के लिए, शी लीड्स इम्पैक्ट फंड बचपन में विवाहित महिलाओं के जीवन में परिवर्तनकारी बदलाव लाने के लिए करीब 20 लाख रुपये की धनराशि भी प्रदान कर रहा है।
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विजयेता कुमार
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘किकिंग बॉल्स’ की निर्देशक विजयेता कुमार कहती हैं, “यह फिल्म मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि मैं राजस्थान से हूं। किकिंग बॉल्स ग्रामीण राजस्थान की इन बहादुर युवा लड़कियों की कहानी है, जो फुटबॉल खेलकर और पढ़ाई के अपने अधिकार के लिए लड़कर जबरन बाल विवाह, गरीबी और जाति उत्पीड़न से बाहर निकलती हैं। यह फिल्म रोजमर्रा के नारीवाद और अविश्वसनीय साहस की खोज के रूप में शुरू हुई।”
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गुनीत मोंगा कपूर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
वहीं, इस फिल्म के बारे में निर्माता गुनीत मोंगा कपूर बताती हैं, “हर साल करीब सवा करोड़ लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले कर दी जाती है। यानी हर मिनट 23 नाबालिग लड़कियों का विवाह हो रहा है। "किकिंग बॉल्स" एक ऐसा प्रोजेक्ट बन गया जिसके बारे में हम जानते थे कि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं हो सकती, बल्कि इस पर एक चर्चा होनी चाहिए। भारत भर के कई स्कूलों में स्क्रीनिंग के दौरान मुझसे हमेशा पूछा जाता था कि मैं इन युवा लड़कियों की मदद के लिए और क्या कर सकती हूं।”