Human Library: क्या हो अगर कोई लाइब्रेरी किताबों की बजाय लोगों को उधार देने लगे? IIT पलक्कड़ में अब ये सिर्फ एक कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत बन रही है। यह मशहूर इंजीनियरिंग संस्थान एक अनोखा "मानव पुस्तकालय" बना रहा है, जहां लोग किताबों की जगह "मानव पुस्तकें" पढ़ सकेंगे। इन "मानव पुस्तकों" से मतलब ऐसे लोगों से है जो अपनी जिंदगी की कहानियां बातचीत के जरिए दूसरों से साझा करेंगे।
IIT: रूढ़ियां तोड़ने और संवाद बढ़ाने की पहल, पलक्कड़ शुरू कर रहा है मानव पुस्तकालय; अनुभवों से मिलेगी सीख
IIT Palakkad: आईआईटी पलक्कड़ ने रूढ़ियों को तोड़ने और संवाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से "मानव पुस्तकालय" शुरू करने की पहल की है। इस अनोखे कार्यक्रम में लोग अपने जीवन के अनुभव साझा करेंगे, जिससे दूसरों को समझ, सहानुभूति और सीखने का अवसर मिलेगा।
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जिनके पास कहानी है, वे बन सकते हैं 'मानव पुस्तक'
उन्होंने कहा कि यह पहल प्रसिद्ध मानव पुस्तकालय आंदोलन से प्रेरित है, जिसकी शुरुआत वर्षों पहले डेनमार्क में हुई थी।
उन्होंने आगे कहा कि संस्थान राज्य में भी इसी तरह की अवधारणा शुरू करने की योजना बना रहा है, जिससे हाशिए पर पड़े लोगों को अपनी निजी कहानियां साझा करने का एक मंच मिल सके।
आईआईटी के एक सहायक प्रोफेसर ने कहा कि मानव पुस्तकालय एक अनूठा स्थान है जहां वास्तविक लोग "किताबें" बन जाते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं, बाधाओं को तोड़ते हैं और सार्थक बातचीत को जन्म देते हैं।
संवाद के जरिए रूढ़ियां तोड़ने की पहल
आईआईटी पलक्कड़ के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर सुदर्शन आर. कोट्टायी ने बताया, "हम अब मानव पुस्तकों की तलाश में हैं - ऐसे व्यक्ति जो अपनी कहानियां साझा करने, रूढ़ियों को चुनौती देने और संवाद के माध्यम से एक अधिक समावेशी दुनिया बनाने में मदद करने के लिए तैयार हों।"
यह एक दिवसीय कार्यक्रम मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग के तत्वावधान में, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के एक प्रमुख कार्यक्रम, उन्नत भारत अभियान (UBA) के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।
समलैंगिक मानसिक स्वास्थ्य शोधकर्ता और प्रशिक्षित नैदानिक मनोवैज्ञानिक सुदर्शन ने कहा कि भेदभाव के शिकार लोगों के लिए ऐसे मंच अपरिहार्य हैं, जहां वे अपने कष्टदायक अनुभवों, आघात भरे क्षणों और जीवन में दैनिक मनोवैज्ञानिक हिंसा और दुर्व्यवहार के बारे में खुलकर बात कर सकें।
भेदभाव के अनुभव ने बढ़ाई पहल की प्रतिबद्धता
संकाय सदस्य ने कहा कि आईआईटी परिसर में भी उन्हें कई तरह की रूढ़ियों के कारण कई भेदभावों का सामना करना पड़ा है, इसलिए वे इस तरह के मंच के महत्व को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं।
उन्होंने बताया, "ह्यूमन लाइब्रेरी में हमारी किताबों (हाशिये पर पड़े लोगों) की कहानियाँ पढ़ने के बाद अगर किसी पाठक (प्रतिभागी) के मन में कोई बदलाव आता है, तो यह धीरे-धीरे सामाजिक बदलाव का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इस तरह के आयोजन का यही उद्देश्य है।"
कोट्टायी ने बताया कि उन्होंने हाल ही में परिसर में ह्यूमन लाइब्रेरी के आयोजन के लिए प्रकाशन साझेदारी हेतु डेनमार्क स्थित संगठन से संपर्क किया था।
उन्होंने कहा, "मैं प्रकाशन साझेदार हूं और आईआईटी पलक्कड़ मेजबान संस्थान है। उनके निर्देशों के अनुसार, हमें एक साल के भीतर इस आयोजन की मेजबानी करनी है। हमारी योजना इसे अगले साल जनवरी या फरवरी में आयोजित करने की है।"
अगर आईआईटी में यह आयोजन सफलतापूर्वक आयोजित होता है, तो साझेदारी का नवीनीकरण हो सकता है और उन्हें पुस्तकालय या टाउन हॉल जैसे सार्वजनिक स्थानों पर इसी तरह के आयोजन करने की अनुमति मिल जाएगी।
मानव पुस्तक बनने के लिए आवेदन शुरू
सहायक प्रोफेसर ने बताया, "भारत में कहीं से भी लोग मानव पुस्तकें बनने के लिए आवेदन कर सकते हैं। लेकिन, डेनमार्क संगठन के दिशानिर्देशों के अनुसार, हम पुस्तकों की भागीदारी के लिए उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं दे सकते, क्योंकि यह पूरी तरह से स्वैच्छिक होना चाहिए।"
आईआईटी पलक्कड़ में यूबीए परियोजना समन्वयक प्रभुल्लादास आर ने कहा कि मानव पुस्तकालय उन हाशिए पर पड़े लोगों के गहन भावनात्मक परिदृश्यों को पहचान प्रदान करता है जिन्हें चुप रहने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
उन्होंने पीटीआई को बताया, "मानव पुस्तकालय एक ऐसी अवधारणा है जिसमें एक व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार पर स्वयं एक पुस्तक बन जाता है।"
उन्होंने कहा कि अब तक के जीवन के उनके गहन व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर उन्हें पुस्तक घोषित किया जाएगा।
उन्होंने बताया, "अब हम ऐसे लोगों की पहचान करने के मिशन पर हैं जिनके पास साझा करने के लिए अनूठी व्यक्तिगत कहानियां हैं। जो लोग इस आयोजन में पाठकों (प्रतिभागियों) के साथ अपने गहन व्यक्तिगत अनुभव साझा करने के इच्छुक हैं, वे अभी आवेदन कर सकते हैं।"
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