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मिल्खा का संघर्ष: पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर जूते किए पॉलिश...ढाबे पर धोए बर्तन, खाई जेल की हवा

Sat, 19 Jun 2021 05:57 PM IST
सुशील कुमार कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुशील कुमार कुमार Updated Sat, 19 Jun 2021 05:57 PM IST
सार

बंटवारे के दौरान ट्रेन की महिला बोगी में सीट के नीचे छिपकर दिल्ली पहुंचे थे। शरणार्थी शिविर में रहकर और ढाबों पर बर्तन साफ कर उन्होंने जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश की। इसके बाद सेना में भर्ती होकर एक धावक के रूप में पहचान बनाई। 

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struggle of flying sikh Milkha singh Polished shoes outside Old Delhi railway station washed pots at dhaba went jail 
मिल्खा सिंह - फोटो : amar ujala
हाथ की लकीरों से जिंदगी नहीं बनती, अजम हमारा भी कुछ हिस्सा है, जिंदगी बनाने में...’ जो लोग सिर्फ भाग्य के सहारे रहते हैं, वह कभी सफलता नहीं पा सकते। एक साक्षात्कार में मिल्खा सिंह की कही ये बातें उनके संघर्ष के दिनों से सफलता के शिखर तक पहुंचने की कहानी को बयां करती हैं।


फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह का कोरोना से चंडीगढ़ में शुक्रवार देर रात निधन हो गया। 91 वर्षीय मिल्खा ने जीवन में इतनी विकट लड़ाइयां जीती थीं, कि शायद ही कोई और टिक पाता। पाकिस्तान के गोविंदपुरा में जन्मे मिल्खा सिंह का जीवन संघर्षों से भरा रहा। बचपन में ही भारत-पाकिस्तान बंटवारे का दर्द और अपनों को खोने का गम उन्हें उम्र भर कसोटता रहा। 

महिला बोगी में सीट के नीचे छिपकर पहुंचे दिल्ली 
बंटवारे के दौरान ट्रेन की महिला बोगी में सीट के नीचे छिपकर दिल्ली पहुंचे थे। शरणार्थी शिविर में रहकर और ढाबों पर बर्तन साफ कर उन्होंने जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश की। इसके बाद सेना में भर्ती होकर एक धावक के रूप में पहचान बनाई। 

दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर जूते पॉलिश किए
वे कुछ समय तक शरणार्थियों के लिए बने शिविर में रहे। इस दौरान पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने फुटपाथ पर बने ढाबों में बर्तन साफ किए ताकि कुछ खाने को मिल सके, चाहे वो बचा खुचा ही क्यों न हो। उन्होंने दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर जूते पॉलिश किए और ट्रेनों से सामान चुराकर गुजर-बसर किया। वह जेल भी गए और उनकी बहन ईश्वर ने अपने गहने बेचकर उन्हें छुड़ाया।
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मिल्खा सिंह - फोटो : amar ujala
भाई के कहने पर सेना में हुए भर्ती
बाद में अपने भाई मलखान सिंह के कहने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया और 1951 में सेना में भर्ती हो गए। इसके बाद क्रास कंट्री रेस में छठे स्थान पर आए। इस सफलता के बाद सेना ने उन्हें खेलकूद में स्पेशल ट्रेनिंग के लिए चुना।

 
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मिल्खा सिंह - फोटो : amar ujala
80 अंतरराष्ट्रीय दौड़ों में 77 जीतीं, 1958 में मिला पद्मश्री अवार्ड
अपनी 80 अंतरराष्ट्रीय दौड़ों में उन्होंने 77 दौड़ें जीतीं, लेकिन रोम ओलंपिक का मेडल हाथ से जाने का गम उन्हें जीवन भर रहा। उनकी आखिरी इच्छा थी कि वह अपने जीते जी किसी भारतीय खिलाड़ी के हाथों में ओलंपिक मेडल देखें, लेकिन अफसोस उनकी अंतिम इच्छा उनके जीते जी पूरी न हो सकी। हालांकि, मिल्खा सिंह की हर उपलब्धि इतिहास में दर्ज रहेगी और वह हमेशा हमारे लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे। 1958 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा था। 2001 में भारत सरकार द्वारा अर्जुन पुरस्कार देने की पेशकश की गई, जिसे मिल्खा सिंह ने ठुकरा दिया था। 

 
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पीएम नरेंद्र मोदी और मिल्खा सिंह - फोटो : twitter
स्वतंत्र भारत के बने पहले धावक
1956 में मेलबोर्न में आयोजित ओलंपिक खेलों में 200 और 400 मीटर रेस में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1958 में कटक में आयोजित राष्ट्रीय खेलों में उन्होंने 200 और 400 मीटर दौड़ में राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित किया। एशियन खेलों में भी इन दोनों प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक हासिल किया। वर्ष 1958 में उन्हें एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली, जब उन्होंने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों में 400 मीटर प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। इस प्रकार वह राष्ट्रमंडल खेलों के व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले स्वतंत्र भारत के पहले धावक बन गए।

 
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उड़न सिख मिल्खा सिंह
अयूब खान ने उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ की संज्ञा दी 
रोम ओलंपिक से पहले उन्होंने पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को हराया था। मिल्खा सिंह पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे, जहां उनके माता-पिता की हत्या हुई थी, लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू के कहने पर वह गए। उन्होंने खालिक को हराया और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ की संज्ञा दी। 
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