28 जनवरी...रात करीब 8 बजे का वक्त...दिल्ली की तमाम सीमाओं पर बर्फीली हवाओं और मूसलाधार बारिश के बावजूद करीब दो महीने से डटे हजारों किसानों के कंधे झुके हुए थे...कारण था 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले में हुआ उपद्रव...तिरंगे के अपमान का घाव हर किसी के दिल-ओ-दिमाग पर इतना गहरा लगा था कि किसान आंदोलन का बोरिया-बिस्तर महज चंद घंटों में बंधना तय हो गया था...ऐसा लगना लाजिमी ही था, क्योंकि किसान गाजीपुर का 'रण' छोड़ने की तैयारी लगभग कर चुके थे...अचानक भाकियू नेता राकेश टिकैत के आंसुओं का सैलाब फूटा, जो किसानों की अस्मत से जुड़ गया...और दिल्ली हिंसा के बाद डगमगा रहे टिकैत एक बार फिर गाजीपुर के मैदान में टिक गए। इसके साथ ही किसान आंदोलन में फिर तड़का लग गया...क्या वाकई आंसुओं और अस्मत के कनेक्शन ने किसानों का मोर्चा मजबूत किया या इसके पीछे कोई और मसला भी है...क्या है एक बार फिर किसानों के गरमाते मिजाज की असल वजह, जानते हैं इस रिपोर्ट में...
आंसुओं ने भड़का दी आंदोलन की 'आग'
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किसान नेता राकेश टिकैत
- फोटो : amar ujala
गौरतलब है कि गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा के बाद सरकार और किसानों के बीच तनातनी बढ़ गई। इसके बाद गाजीपुर सीमा को छावनी में बदल दिया गया। बड़ी तादाद में पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के जवान तैनात किए गए। साथ ही, धारा 144 भी लगा दी गई। अटकलें लगने लगीं कि राकेश टिकैत आत्मसमर्पण करेंगे या उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा? इस बीच उनके भाई नरेश टिकैत ने भी धरना खत्म होने का एलान कर दिया, लेकिन आखिरी संबोधन में छलके राकेश टिकैत के आंसुओं ने पूरा माहौल बदल दिया। इसके बाद केंद्र और यूपी सरकार बैकफुट पर आ गई।
भाजपा विधायक की एंट्री ने बदल दिए हालात?
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भाजपा विधायक नंद किशोर गुर्जर
- फोटो : amar ujala
किसान आंदोलन की जड़ें एक बार फिर मजबूत होने के पीछे गाजियाबाद के लोनी से विधायक नंदकिशोर गुर्जर और साहिबाबाद से विधायक सुनील शर्मा को जिम्मेदार माना जा रहा है। दावा है कि 28 जनवरी की रात नंदकिशोर गुर्जर करीब 100 समर्थकों के साथ धरनास्थल पर आ गए और किसानों के साथ अभद्रता करने लगे। इसके बाद राकेश टिकैत भड़क गए। उन्होंने कहा, 'देश का किसान सीने पर गोली खाएगा, पर पीछे नहीं हटेगा। तीनों कृषि कानून वापस नहीं लिए गए तो आत्महत्या कर लूंगा, लेकिन धरनास्थल खाली नहीं करूंगा।' इस मामले में विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने सफाई दी है। उनका कहना है कि राकेश टिकैत के आरोप पूरी तरह झूठे हैं। वह जेल जाने से बचने के लिए मुझ पर आरोप लगा रहे हैं। मेरी लोकेशन जांच ली जाए। मैं तो राकेश टिकैत के धरने से 10 किलोमीटर के दायरे में भी मौजूद नहीं था।
विपक्षी दलों ने उखड़ते तंबुओं को दिया सहारा?
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अखिलेश यादव, मायावती, राहुल गांधी
राकेश टिकैत के आंसुओं ने न सिर्फ किसानों में एक बार फिर जोश भर दिया, बल्कि विपक्षी दलों को आंदोलन के कंधों पर चढ़कर एक बार फिर राजनीति करने का मौका मिल गया। शासन-प्रशासन ने बिजली-पानी जैसी सुविधाएं हटा लीं तो आम आदमी पार्टी ने पानी का टैंकर पहुंचा दिया। इसके बाद कांग्रेस, बसपा, सपा के साथ-साथ राजद भी किसानों के समर्थन में उतर आया, जिसने आंदोलन के उखड़ते तंबुओं को एक बार फिर सहारा दे दिया।
किसानों की 'अस्मत' से जुड़े टिकैत के आंसू?
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farmers protest up, किसान आंदोलन
- फोटो : farmers protest up, किसान आंदोलन
टिकैत के आंसुओं से सिर्फ आंदोलन की ज्वाला ही नहीं भड़की, बल्कि अपने-अपने घर जा चुके किसानों ने उसे अपनी अस्मत से भी जोड़ लिया। दरअसल, किसानों को अपने नेता का रोना रास नहीं आया। उन्होंने तुरंत ही आंदोलन में वापस लौटने का फैसला कर लिया और 29 जनवरी की सुबह होते-होते गाजीपुर बॉर्डर पर 26 जनवरी जैसा जोश नजर आने लगा। किसानों ने तो अब यहां तक कह दिया है कि अगर हमारे चौधरी साहब को कुछ हो गया तो सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे।