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ये हैं असल जिंदगी के 'पैडमैन', जिन्होंने बदल दी लाखों महिलाओं की जिंदगी

Sat, 23 Dec 2017 08:09 AM IST
अरुणाचलम मुरुगनांथम
अरुणाचलम मुरुगनांथम Updated Sat, 23 Dec 2017 08:09 AM IST
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meet arunachalam muruganantham, who wore a sanitary pad break a taboo
अरुणाचलम मुरुगनांथम

पचपन साल पहले मेरा जन्म तमिलनाडु के कोयंबटूर के एक गरीब परिवार में हुआ था। मेरी मां सिलाई का काम करती थी। मैं बहुत छोटा था, जब मेरे पिता का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था। सिर से बाप का साया उठ जाने से मेरे परिवार के लिए गरीबी और भी भीषण होती जा रही थी। नतीजतन चौदह साल की उम्र में मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। घर के सभी सदस्य भूखे पेट न सोएं, इसलिए मुझे उसी उम्र से काम करना पड़ा। मैंने खेतों से लेकर फैक्टरियों में मजदूरी की। 



शादी होने के कुछ ही समय बाद एक दिन शांति (मेरी पत्नी) अपने पीछे कुछ छिपाए हुए थी। मैंने पूछा कि क्या छिपा रही हो, तो उसने जवाब दिया, यह तुम्हारे काम की चीज नहीं है। मैं पीछे पड़ गया, तो मुझे मालूम हुआ कि वह मुझसे अपने मासिक धर्म के लिए प्रयोग किए जाने वाला कपड़ा छिपा रही थी। मैंने उससे पूछा तुम यह गंदा कपड़ा क्यों इस्तेमाल करती हो? उसने जवाब दिया कि मैं ही नहीं, बल्कि परिवार की दूसरी महिलाएं भी यही कपड़ा प्रयोग करती हैं। 

कारण दोबारा पूछने पर उसका जवाब था, मुझे सैनेटरी पैड के बारे में पता है, पर घर की दूसरी जरूरतें पूरी करनी है इसलिए पैसे बचा रही हूं। मैं हैरान था कि इतनी जरूरी चीज का पैसा दूसरे मद में क्यों खर्च किया जा रहा है। मेरी नई-नई शादी हुई थी, सो मैंने सोचा कि पत्नी को कुछ उपहार दिया जाए। फिर क्या, पत्नी को इंप्रेस करने को मैं उसे सैनेटरी नैपकिन गिफ्ट करने के लिए एक दुकान पर गया। 

बचपन में पिता की मौत के बाद की मजदूरी

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अरुणाचलम मुरुगनांथम

दुकानदार से सैनिटरी पैड मांगने पर उसने अगल-बगल देखा, पैड जल्दी से अखबार में लपेटा और मुझे दे दिया। माहौल ऐसा था, जैसे मैंने किसी प्रतिबंधित वस्तु का आग्रह किया हो! मैंने उनतीस वर्ष की उम्र में पहली बार सैनेटरी पैड छुआ था। मन में जिज्ञासा जगी, तो उसे खोल के देखा। मैं आश्चर्यचकित था कि चंद पैसों के कच्चे माल से बने इस पैड को बहुराष्ट्रीय कंपनियां सैकड़ों गुना कीमत में बेच रही हैं। यहीं से मेरे भीतर इस ख्याल ने जन्म ले लिया कि मुझे एक ऐसा देसी पैड तैयार करना है, जो आम भारतीय महिलाओं की पहुंच में हो। 

मैंने अपने स्तर से सैनेटरी पैड तैयार किया, लेकिन मेरे सामने दिक्कत थी कि इसका परीक्षण कैसे किया जाए। इस काम के लिए मुझे एक महिला स्वयंसेवी की जरूरत थी, पर मेरी पत्नी के अलावा मेरे पास कोई नहीं था। मैंने उसे पैड दिया, तो उसने इसके प्रयोग से मना कर दिया। यही प्रक्रिया मैंने अपनी बहनों के साथ भी अपनाई, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। परीक्षण के लिए मैं मेडिकल कॉलेज की छात्राओं के पास भी गया, पर उन्होंने भी मना कर दिया। 

अंततः मैंने इसे खुद पहनकर यह जानने की कोशिश की कि यह काम करेगा कि नहीं। मैंने पाया कि मेरा पैड कंपनी के पैड के मुकाबले नहीं टिकेगा। फिर मैंने शोध शुरू कर दिया। इस दौरान मुझे न सिर्फ वित्तीय दिक्कतों का सामना करना पड़ा, बल्कि सामाजिक बहिष्कार भी झेलना पड़ा, यहां तक कि तलाक की नोटिस भी। मैं फिर भी नहीं डिगा। 

चार साल की मेहनत के बाद मैंने ऐसी मशीन तैयार कर दी, जिससे ब्रांडेड कंपनियों को टक्कर देने वाले सस्ते पैड बनाए जा सकें। मात्र दो फीसदी महिलाओं द्वारा पैड प्रयोग किए जाने वाले देश में मेरा सपना है कि यह मशीन औरतों को न सिर्फ बेहतर स्वास्थ्य दे, बल्कि कई लोगों को रोजगार भी मुहैया कराए। देश के कई क्षेत्रों में इसकी शुरुआत हो भी चुकी है।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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