उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित जिस रैणी गांव में रविवार को जलप्रलय ने तबाही मचा दी। यह पर्यावरण के क्षेत्र में चले 'चिपको आंदोलन' की नैत्री गौरा देवी का गांव है। सालों पहले पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाने वाली गौरा देवी का गांव आज आपदा को झेल रहा है।
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चमोली में आपदा
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जोशीमठ-मलारी हाईवे पर जोशीमठ से करीब 23 किलोमीटर की दूरी पर रैणी गांव स्थित है। इसके साथ ही यहां आसपास पेंण, मुरंडा, पल्ला रैणी, लाता, सुरांईथोटा, सुकी, भलागांव, तोलमा, फक्ती, तमक और लौंग गांव हैं। जहां की जनसंख्या करीब दो हजार तक है। पर्यावरणविद् पद्मभूषण डॉ.अनिल जोशी ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में बांध बनाने के लिए नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है।
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चमोली में तपोवन डेम
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ग्लेशियरों के मुहाने पर बांध का निर्माण करना पर्यावरण और प्राकृतिक दृष्टिकोण से सही नहीं है। नीती घाटी तपोवन क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने के दुष्परिणाम सामने हैं। हिमालयी क्षेत्रों में बांधों के निर्माण नेे ग्लेशियरों की जड़ें हिला दी हैं। धड़ाधड़ बन रहे बांधों पर जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में असंतुलित विकास का परिणाम है कि सर्दियों के मौसम में ग्लेशियरों के टूटने से तबाही मच रही है।
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चमोली में आपदा
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मैती आंदोलन के संस्थापक पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड में बड़े बांधों का निर्माण पर्यावरण के लिए घातक है। हिमालयी क्षेत्र में मानव हस्तक्षेप बढ़ने के कारण प्राकृतिक आपदा की घटनाएं बढ़ रही है। पहली बार सर्दियों के मौसम में ग्लेशियर टूटने से तबाही मची है।
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चमोली में ग्लेशियर फटने के बाद धौली नदी में मलबा
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पर्यावरण संरक्षण पर काम कर रहे सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनफिटी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में सतत विकास के लिए सबसे पहले कैरिंग क्षमता पर अध्ययन होना चाहिए। 20 सालों में यह तय नहीं हो पाया कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने के लिए क्या मॉडल होना चाहिए। केदारनाथ आपदा के बाद चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से मची तबाही एक बार फिर चेतावनी है।