केदारनाथ के बारे में एक कथा प्रचलित है कि जब देवताओं की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव बैल रुप में प्रकट हुए तो उन्होंने कहा किसे चीरू और किसे फाडूं। जानिए फिर क्या हुआ। साथ ही कुछ और रोचक तथ्य।
भगवान शिव के परम धाम की ऐसी बातें, जो हर शिवभक्त को जाननी चाहिए...
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केदारनाथ के बारे में एक कथा के अनुसार, असुरों से बचने के लिए देवता गणों ने भोलेनाथ की आराधना की थी। जिसके बाद शिव बैल रूप में प्रकट हुए और उन्होंने पूछा 'कोदारम' (किसी चीरूं किसे फाडूं)। इसके बाद शिव ने अपने सींगों और खुरों से असुरों का नाश किया और उन्हें मंदाकिनी नदी में फेंक दिया। कोदारम् से ही इस जगह का केदारनाथ पड़ गया।
केदारनाथ मंदिर कितना पुराना है इसके बारे में कोई प्रमाण नहीं है। हालांकि एक हजार वर्षों से केदारनाथ धाम की तीर्थयात्रा का सिलसिला निरंतर जारी है।
केदारनाथ के मुख्य पुजारी कर्नाटक के वीराशैवा समुदाय से वास्ता रखते हैं और उन्हें 'रावल' नाम से पुकारा जाता है। रावल प्रमुख पुजारी होने के बावजूद दूसरे मंदिरों की तरह केदारनाथ में खुद से पूजा नहीं करते हैं, बल्कि वो दूसरे पंडितों को पूजा करने के निर्देश देते हैं।
इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया।
पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे।
भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले।
पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया।