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भगवान शिव के परम धाम की ऐसी बातें, जो हर शिवभक्त को जाननी चाहिए...

Thu, 31 Aug 2017 05:44 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 31 Aug 2017 05:44 PM IST
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special facts of kedarnath
kedarnath

केदारनाथ के बारे में एक कथा प्रचलित है कि जब देवताओं की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव बैल रुप में प्रकट हुए तो उन्होंने कहा किसे चीरू और किसे फाडूं। जानिए फिर क्या हुआ। साथ ही कुछ और रोचक तथ्य।

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kedarnath

केदारनाथ के बारे में एक कथा के अनुसार, असुरों से बचने के लिए देवता गणों ने भोलेनाथ की आराधना की थी। जिसके बाद शिव बैल रूप में प्रकट हुए और उन्होंने पूछा 'कोदारम' (किसी चीरूं किसे फाडूं)। इसके बाद शिव ने अपने सींगों और खुरों से असुरों का नाश किया और उन्हें मंदाकिनी नदी में फेंक दिया। कोदारम् से ही इस जगह का केदारनाथ पड़ गया।

केदारनाथ मंदिर कितना पुराना है इसके बारे में कोई प्रमाण नहीं है। हालांकि एक हजार वर्षों से केदारनाथ धाम की तीर्थयात्रा का सिलसिला निरंतर जारी है।

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kedarnath

केदारनाथ के मुख्य पुजारी कर्नाटक के वीराशैवा समुदाय से वास्ता रखते हैं और उन्हें 'रावल' नाम से पुकारा जाता है। रावल प्रमुख पुजारी होने के बावजूद दूसरे मंदिरों की तरह केदारनाथ में खुद से पूजा नहीं करते हैं, बल्कि वो दूसरे पंडितों को पूजा करने के निर्देश देते हैं।

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kedarnath - फोटो : amarujala

इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया।

पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे।

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kedarnath in 1880

भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले।

पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया।

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