एक ऐसी आवाज जिसे सुनकर देवता भी जागृत हो जाते हैं। यही वजह है कि भारत सरकार भी आज इस आवाज के धनी लोकगायक को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया है।
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pritam bharatwan
- फोटो : file photo
गांवों में पारंपरिक रूप से गाये जाने वाले जागरों को दुनिया भर के मंचों तक पहुंचाकर सम्मान दिलाने का श्रेय जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण को ही जाता है। उत्तराखंड के प्रत्येक जिले व गांव में लोग अपने अपने आराध्य देवताओं के दर्शन पा सके इसके लिए पूजा पाठ करते है,लेकिन ऐसी मान्यता है कि जागरों का देवताओं पर सबसे अधिक प्रभाव होता है। ऐसे में प्रीतम भरतवाण अकेले ऐसे गायक है जिनकी आवाज से देवता भी पवित्र व्यक्ति पर अवतरित हो जाते है।
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प्रीतम के प्रयासों का ही नतीजा है कि कभी औजी या दास (ढोलवादक) समुदाय तक सीमित रहे जागर आज न केवल समाज के सभी वर्गों में सुने और गाये जाते हैं बल्कि उन्हें पूरा सम्मान भी दिया जाता है। उनकी इन उपलब्धियों के लिए ही भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।
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प्रीतम भरतवाण का जन्म देहरादून के रायपुर ब्लॉक स्थित सिला गांव के एक औजी परिवार में हुआ। अपने दादा और पिता की तरह उन्होंने भी ढोल वादन के अपने पारंपरिक व्यवसाय को आगे बढ़ाया। मात्र छह वर्ष की उम्र में ही उन्होंने विरासत में मिले ढोल वादन और जागर गायन के अपने हुनर का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करना शुरू कर दिया।
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वह अपने पिता के साथ गांव-घरों में गाए जाने वाले जागरों में संगत करने लगे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा गांव के ही विद्यालय से हुई। वह स्कूल में आयोजित होने वाले हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेते।