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शहीद पिता को याद कर भर आईं बेटे की आंखें, बोला रियल हीरे थे मेरे पापा, मैं लूंगा उनकी शहादत का बदला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: अलका त्यागी
Updated Thu, 21 Feb 2019 04:34 PM IST
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martyr mohan lal raturi
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पापा! मैं लूंगा आपकी शहादत का बदला। आप पूछते थे न कि बेटा बड़ा होकर क्या बनेगा... मैं भी वतन की हिफाजत के लिए फौज में जाऊंगा। देश के दुश्मनों को मार भगाऊंगा। यह कहते-कहते सीआरपीएफ के एएसआई शहीद मोहनलाल रतूड़ी ( मूल निवासी गांव बनकोट, चिन्यालीसौड़, जिला उत्तरकाशी) के सबसे छोटे लाडले राम रतूड़ी की आंखें भर आईं। गला रुंध गया। बोला-मेरे पापा रियल हीरो थे। देश के हीरो। उनके जैसा कोई नहीं।
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martyr mohal lal raturi
कांवली रोड स्थित नेहरू पुरम एमडीडीए कॉलोनी में पहले माले का दो कमरों का फ्लैट। भीतर हल्की रोशनी वाले कमरे में बैठा 14 साल का बेटा राम। पिता की तस्वीर को एकटक होकर देखे जा रहा है। कमरे में अंधेरा जरूर है, लेकिन राम की आंखों में चमक है। देश की सेवा करने का सपना है। तस्वीर के दोनों और फूल लगे हुए हैं, जो कि अपनी खुशबू से पूरे कमरे को महका रहे हैं। तस्वीर में वर्दी पहने हुए पापा शहीद मोहनलाल रतूड़ी सीना ताने खड़े हैं।
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शहीद मोहनलाल रतूड़ी
जैसे ड्यूटी पर जाने से ठीक पहले की तस्वीर हो। हमेशा ऐसे ही सीना तानकर रखते थे पापा। तस्वीर को निहारते हुए राम अतीत में खो जाता है। पापा आए थे, 22 दिन तक हमारे साथ रहे। 27 दिसंबर को जब जा रहे थे तो बोले, बच्चों अब मैं फरवरी में आऊंगा। फरवरी में...आंसू निकल आए...आंसुओं को किसी तरह संभाला...फिर बोला...पापा फरवरी में आए लेकिन ऐसे...।
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राम वैसे तो अपने परिवार में सबसे छोटा है, लेकिन पापा की शहादत ने उसे जिम्मेदार बना दिया है। अपने परिवार का भी और देश का भी। मासूम चेहरे पर पापा की याद में आए भाव बरबस ही याद दिला देते हैं कि अब सिर पर पापा का साया नहीं है, लेकिन उनकी यादें फिर उसका सहारा बन जाती हैं। हौसला बन जाती हैं, इन हालात से लड़ने का। राम कहता है कि मैं भी सेना में जाऊंगा। पापा की तरह सीना तानकर देश के दुश्मनों से बदला लूंगा।
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राम ने बताया कि उसके पापा पहले तो झारखंड के नक्सली इलाके में तैनात थे, लेकिन करीब दो साल से वह कश्मीर में थे। जब दिसंबर में आए थे तो कश्मीर की बातें सुनाते थे। बताते थे वहां बहुत आतंक है। जितनी ठंड है, उससे ज्यादा माहौल आतंक की वजह से गर्म रहता है। रात को कभी भी ऑपरेशन शुरू होता है तो कई-कई दिन तक चलता है। ठंड में भूख लगती है, लेकिन खाना खाने की हिम्मत नहीं होती।
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