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नागराज के लिए गांव वालों ने बनाई सवा मन की रोटी

Fri, 22 May 2015 04:06 PM IST
टीम डिजिटल / अमर उजाला, देहरादून
टीम डिजिटल / अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 22 May 2015 04:06 PM IST
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नागराज के लिए गांव वालों ने बनाई सवा मन की रोटी

puja in naag raja temple of srinagar garhwal.

भारत में तरह-‌तरह की धार्मिक परंपराएं प्रचलित हैं। इसी क्रम में उत्तराखंड के श्रीनगर की ग्राम पंचायत उफल्डा में बारिश और सुख समृद्धि के लिए नागराजा मंदिर में सवा मन (40 किलो) का रोट बनाया गया। रोट के एक हिस्से को नागराज को चढ़ाकर शेष भक्तों में वितरित किया गया।

नागराज के लिए गांव वालों ने बनाई सवा मन की रोटी

puja in naag raja temple of srinagar garhwal.

सदियों से चली आ रही परंपरा का निर्वह्न करते हुए शुक्रवार को उफल्डा और आसपास के गांव के लोगों ने नागराजा देवता की पूजा की। सुबह 10 बजे से गांव के बीच स्थित नागराजा मंदिर में 40 किलो आटे को गूंथा गया। इसके साथ ही मंदिर परिसर में रोट पकाने के लिए उपले और लकडिय़ों में आग लगाई गई।

नागराज के लिए गांव वालों ने बनाई सवा मन की रोटी

puja in naag raja temple of srinagar garhwal.

लगभग दो घंटे तक आटा गूंदने के बाद उसको पकाने के लिए अंगारों से ढक दिया गया। जिस दौरा आटा गूंदने और रोट बनाने की प्रक्रिया चल रही थी, उसी दौरान महिलाओं पर देवी-देवता अवतरित हुए। उन्होंने श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हुए मंगलकामना की।

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नागराज के लिए गांव वालों ने बनाई सवा मन की रोटी

puja in naag raja temple of srinagar garhwal.

नागराजा एक बार किसी ग्रामीण के सपने में आए कि वह गांव से ऊपर एक चोटी पर जाना चाहते हैं। ग्रामीण ने जब वहां पानी न होने का हवाला दिया, तो उन्होंने इसकी चिंता न करने को कहा। फलस्वरुप ग्रामीणों ने गांव से करीब दो किलोमीटर ऊपर मंदिर बना दिया। उन्होंने बताया कि मंदिर का ही एक रुप गांव के बीच में स्थापित किया गया है। जहां भोग चढ़ाया जाता है।

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नागराज के लिए गांव वालों ने बनाई सवा मन की रोटी

puja in naag raja temple of srinagar garhwal.

स्थानीय निवासी ऋषि भट्ट ने बताया कि प्रत्येक तीन साल बाद यह पूजा होती है। नागराजा को चढ़ाया जाने वाला रोट नए गेहूं से तैयार आटे का बनाया जाता है। मान्यता है कि नागराजा को रोट चढ़ाने से बारिश होती है। जिससे फसलें ठीक होती हैं। उन्होंने बताया कि कहा जाता है कि पूर्व में नागराजा का मंदिर गांव से नीचे अलकनंदा नदी किनारे था।

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