रोंगटे खड़े कर देगी अंग्रेजों को कंपाने वाले पेशावर कांड के नायक की कहानी
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1891 में गढ़वाल के एक किसान परिवार में जन्मे चंद्र सिंह को पिता पढ़ा नहीं सके लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत से खुद पढ़ना लिखना सीख लिया था। चंद्र सिंह ने 1914 में लैंसडौन में अंग्रेजी सेना में भर्ती हो गए। यही वह समय था जब प्रथम विश्वयुद्ध की शुरूआत हो चुकी थी। 1915 में ही चंद्र सिंह को अंग्रेजी सेना ने लड़ने के लिए फ्रांस भेज दिया।
विश्वयुद्ध के दौरान ही 1917 में एक बार फिर अंग्रेजी सेना की ओर से चंद्र सिंह ने मेसोपोटामिया के युद्ध में भाग लिया। इसके बाद इन्हें बगदाद की लड़ाई में भी भेजा गया। इस समय तक चंद्रसिंह हवलदार रैंक तक पहुंच चुके थे। लेकिन विश्वयुद्ध समाप्त हो जाने पर भारतीय सैनिकों की छटनी शुरू हो गई। चंद्र सिंह निकाला तो नहीं गया लेकिन हवलदार से सैनिक बना दिया गया। इससे नाराज चंद्रसिंह ने सेना छोड़ने का मन बनाया। जब अधिकारियों को बात पता चली तो उन्होंने इन्हें रोक लिया।
बाद में इन्हें तरक्की देकर बजीरिस्तान भेज दिया गया लेकिन तब तक चंद्रसिंह पर देश में चल रहे आजादी के आंदोलन का असर पड़ चुका था। अंग्रेज अफसरों को इसकी भनक लगी तो इन्हें खैबर दर्रे पर भेज दिया गया। तब तक चंद्र सिंह हवलदार मेजर के पद पर पहुंच चुके थे। इसी समय पेशावर में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में लाल कुर्ती आंदोलन जोरों पर था।
अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए चंद्र सिंह के नेतृत्व में गढ़वाल रायफल्स को भेजा। वह 23 अप्रैल 1930 का एक दिन था। पेशावर के किस्सा खवानी बाजार में खान अब्दुल गफ्फार खान के लाल कुर्ती आंदोलनकारियों की एक सभा चल रही थी। कैप्टन रिकेट ने सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया लेकिन चंद्रसिंह ने रिकेट को ये कहते हुए कि हम निहत्थे लोगों पर गोली नहीं चलाते, सीज फायर का आदेश दे दिया।