राजनीति के पंडित एनडी तिवारी नहीं रहे। राजनीति का ये सूरज डूबा जरूर है। मगर तकरीबन सात दशकों की राजनीतिक यात्रा में अपने पीछे कुछ ऐसे पड़ाव छोड़ गया है, जो एनडी के सियासी कृतियों से रोशन रहेंगे। वे देश के पहले ऐसे राजनीतिज्ञ थे, जिन्हें दो-दो राज्य का मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ। वह नेहरू-गांधी के दौर के उन चंद दुर्लभ नेताओं में थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में सक्रिय योगदान दिया।
डूबकर भी रोशनी बिखेरेगा राजनीति का ये सूरज, तस्वीरों में देखें एनडी तिवारी का सफर
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केंद्र में वित्त, विदेश, उद्योग, श्रम सरीखे अहम मंत्रालयों की कमान संभाल चुके एनडी को जब उत्तराखंड सरीखे छोटे राज्य की कमान सौंपी गई तो उत्तराखंड की आंदोलनकारी शक्तियां असहज और स्तब्ध थी। सियासी जानकारों की मानें तो असहज तो एनडी भी थे, जो प्रधानमंत्री की कुर्सी से चंद कदम फासले से एकाएक सुदूर उत्तराखंड भेज दिए गए थे। 'मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा’ कहने वाले एनडी को कांग्रेस हाईकमान ने उसी राज्य का मुखिया बना दिया था। उनके इस कथन ने एनडी का हमेशा प्रेत की तरह पीछा किया।
मगर पांच साल के शासन के बाद जब एनडी सत्ता की अयोध्या से सुदूर दक्षिण राज्य आंध्रप्रदेश में राज्यपाल बनाकर भेजे गए तो इसे उनके दंडकारण्य के रूप में देखा गया। जानकारों की मानें तो जाने से पहले एनडी उत्तराखंड में अवस्थापना विकास और उद्योग की जो आधारशिला रख गए थे, उस पर ये नवोदित राज्य आज मजबूती से खड़ा होने लायक बन पाया है। उनके अनुयायियों ने एनडी के लिए विकास पुरुष की उपमा गढ़ी। मगर उनके पक्ष और विपक्ष में बैठे प्रतिद्वंद्वी भी उत्तराखंड के विकास में एनडी के योगदान की दाद देते हैं।
मुख्यमंत्री बनने के बाद एनडी ने अपने केंद्रीय रिश्तों के दम पर निवेशकों को उत्तराखंड आने को विवश किया। राजमार्गों और सर्किल मार्गों को रिकार्ड समय में तैयार कराया। नये राज्य की तरक्की उनके विजन से ही उनके उत्तराधिकारी आगे की राह तैयार करते आए हैं। एनडी राजनीति के क्षितिज पर उस सूरज की तरह रहे, जिसे उतार-चढ़ाव और विवादों के काले बादल ज्यादा समय तक नहीं छिपा सके। अब अस्त होने के बाद भी राजनीति का ये सूरज अपने पीछे कृतित्व और दृष्टि रोशनी छोड़ गया है।
18 अक्टूबर 1925 को नैनीताल जिले के बल्यूटी गांव में जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा बरेली के एडवर्ड मेमोरियल हाईस्कूल में। 1939 में हाईस्कलू और 1941 में इंटर की परीक्षा प्राइवेट उत्तीर्ण की। मात्र 17 वर्ष की आयु में स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हो गए। 19 दिसंबर 1942 को पिता के साथ गिरफ्तार हुए और नैनीताल जेल में बंद रहे। 1944 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की विधिवत रूप से सदस्यता ली। छह दिसंबर 1945 को इलाहाबाद विवि छात्र संघ को पुनर्जीवित किया। 1945-49 तक आल इंडिया स्टूडेंट कांग्रेस के सचिव बनें। आजादी के तुरंत बाद 1948 में समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। मार्च 1952 में नैनीताल विधानसभा में प्रजा समाजवादी पार्टी से विधायक बनें। मार्च 1957 में दूसरी बार नैनीताल विधानसभा से चुनाव जीते। यूपी विधानसभा में विपक्ष के उपनेता व कार्यवाह बने।