त्रेता युग में साठ हजार सगर पुत्रों की राख न बहानी होती तो इस धरती पर गंगा भी न आती। ऐसा होता तो न तो समूची मानव जाति पापों से तर पाती और न आर्यावर्त के उत्थान का गवाह कोई बनता। विशुद्ध रूप से अस्थियों को बहाने के लिए ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक छोडक़र धरती पर बहती गंगा को करीब दस लाख वर्ष बीत चुके हैं।
गंगा नदी के धरती पर आने के पीछे छिपा ये रहस्य नहीं जानते होंगे आप
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भगवान राम के पुरखे थे राजा सगर। वस्तुत: ब्रह्मा से सूर्यवंश का जन्म हुआ। मनु पहले सूर्यवंशी थे। मनु के पुत्र इक्षवाकु हुए, जिनके पौत्र राजा सगर थे। सगर की दो पत्नियां केशनी और सुमती थी। तप से सुमती को साठ हजार पुत्र हुए, जबकि केशनी को असमंजस नाम के एक पुत्र हुए।
आकाशवाणी हुई कि इनकी मुक्ति तभी हो सकती है जब स्वर्ग से गंगा धरती पर आ जाए। उनकी राख बहाने का बीड़ा उनके सौतेले भाई असमंजस ने उठाया। उनके पुत्र अंशुमान हुए जिनके पुत्र राजा दिलीप थे। वे सभी गंगा लाने में समर्थ नहीं हुए। सगर के प्रपौत्र भगीरथ लंबी तपस्या के बाद गंगा को ब्रह्मलोक से स्वर्गलोक और स्वर्गलोक से शिव की जटाओं में लाने में सफल हुए। वहीं गंगा बहते हुए वर्तमान गंगा सागर के कपिलमुनि आश्रम पहुंची और सगर पुत्रों की राख बहाई। सगर और भगीरथ दोनों ही भगवान राम के पुरखे थे।
गंगा का जन्म वास्तव में ब्रह्मलोक में राधा-कृष्ण के महारास से वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन हुआ था। मंगलवार को मां का जन्मोत्सव समूचे गांगेय क्षेत्र में गंगा सागर तक मनाया जाएगा। इसी दिन गंगा शिव की जटाओं में समाई थी और वहां से समुद्र मिलन के लिए भगीरथ के पीछे-पीछे कपिलमुनि के आश्रम के लिए चली थी।