प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मन की बात कार्यक्रम में जल संरक्षण के लिए किए गए उपायों के लिए कई प्रेरक लोगों की कहानियां सुनाईं। उन्होंने 40 साल से पर्यावरण और जल संरक्षण के प्रति समर्पित उत्तराखंड की गरुड़ तहसील के सिरकोट निवासी जगदीश कुनियाल की मेहनत और लगन का जिक्र करते हुए कहा कि उनका काम भी बहुत कुछ सिखाता है।
जानिए कौन हैं जगदीश कुनियाल, जिनके इस काम के मुरीद हुए पीएम नरेंद्र मोदी, मन की बात में की तारीफ
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम ने बागेश्वर जिले को एक बार फिर से चर्चा में ला दिया है। प्रधानमंत्री से सराहना पाने के बाद जगदीश कुनियाल राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में छा गए। वहीं मुख्यमंत्री ने भी पीएम के मन की बात कार्यक्रम को री-ट्वीट करते हुए कुनियाल की मेहनत को सराहा है। 57 साल के कुनियाल इसे अपने जीवन का अमूल्य क्षण बताते हैं।
मन की बात में जिक्र आने के बाद कुनियाल बेहद उत्साहित भी हैं। कुनियाल ने 18 वर्ष की आयु में गांव की बंजर जमीन पर पौधरोपण का कार्य शुरू किया था। कुनियाल के बसाए जंगल से क्षेत्र में सूख रहे प्राकृतिक जल स्रोतों को नया जीवन मिल रहा है। गांव के करीब आधा दर्जन छोटे-बड़े जलस्रोतों का पानी लगातार कम होता जा रहा था। पौधे बढ़ते गए तो स्रोतों में पानी की मात्रा भी बढ़ने लगी। वर्तमान में गांव के सभी जल स्रोतों में भरपूर पानी है, जिसका उपयोग लोग पीने के अलावा खेती के काम में भी कर रहे हैं।
अमर उजाला से बातचीत में कुनियाल ने बताया कि बंजर जमीन को उपजाऊ बनाना आसान नहीं था। दिन-रात कड़ी मेहनत करनी पड़ी। उनके बसाए जंगल को कई बार नष्ट करने की भी कोशिश की गई। वह पौधे लगाते और कुछ अराजक तत्व उन्हें नष्ट कर देते। जंगली जानवरों का खतरा अलग से था। इसे देखते हुए उन्होंने 20 साल पहले निजी खर्च पर दो स्थानीय युवाओं को जंगल की सुरक्षा के लिए रोजगार पर रखा। युवाओं को रोजगार देने के बाद उनकी आय के संसाधन जुटाने के लिए चाय की खेती भी करनी शुरू की। चाय का उत्पादन शुरू होने के बाद से दोनों कर्मचारियों को भी अच्छी आय हो रही है। विषम परिस्थितियों में किए गए कार्यों के कारण ही आज वह एक हरे-भरे जंगल के जनक हैं।
जगदीश के साथ 1990 से जुड़े अमस्यारी के पर्यावरण प्रेमी बसंत बल्लभ जोशी बताते हैं कि कुनियाल को दिखावा और शोर शराबा पसंद नहीं है। वह जमीन से जुड़कर कार्य करने पर विश्वास रखते हैं। उनके इसी जुनून और जज्बे ने क्षेत्र के कई प्राकृतिक स्रोतों को नया जीवन दिया है। उनकी मेहनत के कारण चीड़ से भरे जंगलों के बीच बांज, बुरांश, देवदार, उतीस जैसे पौधों की पैदावार हो रही है। उन्होंने अपने जंगल में उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाला अंगु का पौधा भी लगाया है।