कांवड़ यात्रा के लिए एक कांवड़िए को सख्त नियमों को पालन करना होता है। परिजन भी उस दिन से ही नियम में बंध जाते हैं, जिस दिन से घर से कोई यात्रा पर निकलता है। दोनों में से किसी ने नियम का उल्लंघन किया तो बताया जाता है कि दूसरे को बेहद तकलीफ उठानी पड़ती है।
कांवड़ 2018: इन नियमों के पालन से खुश होते हैं भगवान शिव, गलती करने पर देते हैं सजा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
परंपरा, मान्यता और नियम के तहत की गई यात्रा करने पर ही किसी परिवार को जन्मों-जन्मांतरण का पुण्य प्राप्त होता है। जब कोई शिवभक्त कांवड़ यात्रा पर घर से निकलता है तो वह अपनी बहन से टीका लगाकर निकलता है। लौटने पर बहन भाई की आरती उतारती है।
मान्यता यह भी है कि जब तक कांवड़िया घर नहीं पहुंचता उसके घर में छौंक नहीं लगता। कहते हैं घर में छौंक लगाने से यात्रा पर निकले कांवड़िए के पैरों में छाले पड़ जाते हैं। जब तक कांवड़िया घर नहीं पहुंच जाता तब तक घर में शिव और माता गंगा के भजन-कीर्तन गाए जाते हैं।
रात में भजन-कीर्तन सुनने वालों को प्रसाद के रूप में खील बताशे के बांटे जाते हैं। नियम यह भी है कि यात्रा के दौरान कोई भी कांवड़िया अपनी कांवड़ को जमीन पर नहीं रखता। दैनिक कर्म करते समय कांवड़िया कांवड़ को दूसरे व्यक्ति को देता है। यदि कोई भक्त अकेले यात्रा करता है तो वह दैनिक कर्म या विश्राम की अवस्था में कांवड़ को किसी पेड़ पर टांगते हैं। इस तरह से कांवड़ यात्रा संपन्न होती है।
कांवड़ यात्रा का इतिहास बहुत पुराना है। परंतु इसे शुरू करने का श्रेय श्रवण कुमार को जाता है। उन्होंने अपने बूढ़े माता-पिता की तीर्थयात्रा करने की इच्छा पर उन्हें कांवड़ में बैठाकर और कांवड़ कंधे पर उठाकर चारों धामों की पैदल यात्रा कराई थी। बाद में लोगों ने इस यात्रा को वर्तमान कांवड़ यात्रा के रूप में जारी रखा।