अनेक ऋषि मुनियों ने योग को विश्वभर में प्रणीत किया। इस धरती से हमारा योग विदेशों के लिए चला था और वहां जाकर धीरे-धीरे योग से योगा में बदल गया। 20 बरस पहले रामदेव ने योग को एक बार फिर से विश्व पटल पर अपने मूल स्वरूप में लाने के प्रयास शुरू किए। आते-आते पतंजलि का वह योग एक बार फिर योगा से बदल कर योग के रूप में प्रचलित हो गया है।
उत्तराखंड की धरती ऋषियों की कर्म भूमि रही है। नया दौर आने पर आजादी के बाद इसी धर्म भूमि के साधु-संतों ने योग को विदेशों में फैलाना शुरू किया। उन योगियों में स्वामी शिवानंद, स्वामी राम, स्वामी ओंमकारानंद, महेश योगी, योगेश्वर, महेशानंद, राम मुलख आदि प्रमुख थे। प्रोफेसर एम लाल और श्याम लाल ने भी योग को फैलाने का काम किया।
जिस समय कश्मीर की धरती से धीरेंद्र ब्रह्मचारी योग को दुनिया भर में ले जा रहे थे, उस समय योग के प्रति दुनिया में फैला आकर्षण साधकों को योग के नियम, ध्यान, समाधि और अष्टांग योग की तलाश में हरिद्वार-ऋषिकेश की इस पावन भूमि पर ला रहा था। इस धरती से योग तमाम यूरोप, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन आदि गया।
भाषायी अंतर ने भारत के योग को पश्चिम में योगा बना दिया। कालांतर में भारतीय शिक्षण संस्थाओं में भी योगा नाम चल निकला। आधुनिक होते भारत को अंग्रेजी से प्यार होता जा रहा था और इसी कारण स्वदेश में योग के बजाय योगा प्रचलित हो गया।
करीब 20 वर्ष पूर्व हरिद्वार की इस धरती पर योग की पताका नए सिरे से फैलाने वाले बाबा रामदेव का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने योग और प्राणायाम को देखते ही देखते नया आयाम दे दिया। बाबा के प्रयासों का असर था कि देश का तमाम उच्च वर्ग और राजनीति अपने कमरों में टीवी के सामने बैठकर योग करने लगे। एक बार फिर दुनिया में योग का नाम योग के रूप में फैलने लगा। रामदेव के प्रयासों से देश के प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रख दिया।