हरिद्वार बैरागी कैंप में एक गड्ढे की खोदाई में सरकारी अस्पतालों में आपूर्ति की जाने वाली दवाओं की खेप मिली है। शिकायत मिली तो जिलाधिकारी के निर्देश पर एसडीएम ने जेसीबी से गड्ढा खोदवाकर दवाएं बरामद की। बरामद दवाएं एक्सपायरी और नॉन एक्सपायरी हैं। डीएम ने स्वास्थ्य विभाग को जांच कर मुकदमा दर्ज कराने के निर्देश दिए। मामले में मुख्य चिकित्साधिकारी ने भी एसीएमओ के नेतृत्व में गड्ढे में दवाएं दबाने की जांच के लिए चार सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है।
Haridwar: बैरागी कैंप क्षेत्र में SDM ने मारा छापा, गड्ढे में दबी मिलीं सरकारी दवाईयां, हाल देख रह गए हैरान
एसडीएम ने बताया कि गड्ढे में दबी मिली सभी दवाएं सरकारी हैं। इनमें से कुछ दवाएं एक्सपायरी डेट की हैं तो कुछ एक्सपायर नहीं हुई हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ढाई लाख आंकी गई कीमत
गड्ढे में दबाई गई दवाओं में सिरप, कैप्सूल, टैबलेट आदि मिली हैं। इनमें अधिकांश विटामिन, जिंक और एंटीबाइटिक दवाएं हैं, जिनकी कीमत ढाई लाख रुपये आंकी गई है। बताया जा रहा है कि ये दवाएं कोरोनाकाल में खरीदी गई थीं, लेकिन उपयोग में नही लाई गईं। इन्हें ठिकाने लगाने के लिए गड्ढे में दबा दिया गया।
निगम की जेसीबी होने की चर्चा
गड्ढे में दवाओं को दबाने के लिए स्वास्थ्य विभाग के किसी डॉक्टर या कर्मचारी की ओर से ही नगर निगम हरिद्वार की जेसीबी मंगाने की चर्चा हो रही है। हालांकि, इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही है, लेकिन इसको लेकर स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम में दिनभर बातें होती रहीं।
आखिर क्या रही मंशा
दवाओं को गड्ढे में दबाने की आखिर किसकी क्या मंश रही होगी, इस पर बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। स्वास्थ्य विभाग हर पहलू से जांच में जुट गया है। वर्ष 2010 में रुड़की क्षेत्र में भी बड़ी मात्रा में नष्ट करने के मकसद फेंकी गईं दवाएं मिली थीं। तब भी स्वास्थ्य विभाग की खासी किरकिरी हुई थी।
सिस्टम की लापरवाही से सरकारी धन की बर्बादी
बैरागी कैंप के गड्ढे में मिली सरकारी दवाएं कहीं न कहीं सिस्टम की पोल खोल रही है। इस लापरवाही के कारण ही सरकारी दवाओं को गड्ढे में दबा दिया गया। अस्पतालों में मरीजों को दवा नहीं मिलने पर उन्हें बाहर से खरीदनी पड़ रही है। अक्सर ऐसी शिकायत मरीजों और उनके तीमारदारों की तरफ से मिलती रहती है। इनमें सुधार नहीं किया गया, जिससे बची हुई दवाओं को गड्ढे में तो दबा दिया गया, लेकिन वह मरीजों को नहीं मिली। इससे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बैच नंबर बन सकता है मददगार
सरकारी दवाओं की ओर से बैच नंबर के आधार पर सरकारी अस्पतालों में भेजा जाता है। इसलिए दवाओं के ऊपर अंकित बैच नंबर दवाओं के दबाने का राज खोलने में बहुत ही मददगार साबित हो सकता है, जिससे आरोपियों तक जांच टीम पहुंच सकती है।
दवाओं को इस तरह से गड्ढे में दबाना बहुत ही बड़ा अपराध है। मामले की जांच करने के लिए जांच कमेटी का गठन कर दिया गया है। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. मनीष दत्त, सीएमओ हरिद्वार