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MahaKumbh Mela 2021: गंगा पर तैरती सैकड़ों तंबेड़ों से आता था कुंभ के लिए हजारों मन दूध 

Wed, 23 Dec 2020 12:49 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Wed, 23 Dec 2020 12:49 PM IST
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Maha Kumbh Mela 2021 in Haridwar News: milk came from floating dairies during kumbh
महाकुम्भ मेला 2021 - फोटो : AMAR UJALA FILE PHOTO

कुंभ मेलों के अवसर पर दूध की आपूर्ति हमेशा बड़ी समस्या रही है। पुराने वक्त में कुंभ मेलों में लाखों यात्रियों के प्रतिदिन दूध पहुंचाना टेढी खीर था। 1986 के कुंभ तक आज की तरह अमूल, पराग और आंचल जैसी कंपनियों की दूध सप्लाई नहीं थी।

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तब हजारों मन दूध की सप्लाई गंगा पर तैरती सैकड़ों तंबेड़ के माध्यम से होती थी। कुंभ मेले हों या वर्ष भर पड़ने वाले लक्खी पर्व, दूध लाने का माध्यम तंबेडें ही थे। तंबेड़ दरअसल टिन के कनस्तरों को रस्सियों से बांधकर बनाई गई बड़ी बड़ी नाव होती थी।
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तंबेड़ की इन नावों में आधे कनस्तर खाली रक्खे जाते और आधे कनस्तरों में दूध भरा होता था। कनस्तरों की इन नावों पर बैठकर वन गुर्जर चप्पुओं के सहारे तंबेड़ को खेते हुए हरिद्वार-कनखल के घाटों पर पहुंचते और दूध को दुकानों एवं दुग्ध आढ़तियों तक पहुंचाया जाता।

उस जमाने में चाय का प्रचलन नहीं था

यहां से यह दूध तमाम दुकानों, धर्मशालाओं और घरों में पहुंचाया जाता था। हरिद्वार में आसपास के गांवों और कस्बों से भी साइकिलों और बैलगाड़ियों से दूध लाया जाता था। सैकड़ों क्विंटल दूध पूरे दिन आता था, तब कहीं जाकर दूध की आपूर्ति हो पाती थी।

उन दिनों तमाम वन गुर्जर वीरभद्र ऋषिकेश से रायवाला और गंगा पार के जंगलों में अपने मवेशियों के साथ रहते थे। तमाम दूध कुंभ मेलों पर हरिद्वार में आए लाखों यात्रियों और साधुओं के काम आता था। गंगा के रास्ते लाई गई तंबेड़ों को फिर रस्सियां खोलकर कनस्तरों के रूप में तांगों में रायवाला तक वापस ले जाते थे।

लौटते ही तंबेड़ फिर से भरकर हरिद्वार के कुंभ क्षेत्रों में भेज दी जाती थी। उस जमाने में चाय का प्रचलन नहीं था और लोग सुबह शाम दूध ही पिया करते थे।

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