कुंभ जैसे मेले बड़े-बड़े संतों को आकर्षित करते आए हैं। प्रथम सिख गुरु नानकदेव महाराज भी कुंभ स्नान करने आए थे। हरकी पैड़ी पर स्नान के बाद उन्होंने दक्षिण दिशा स्थित विष्णुघाट पर ज्ञान गोदड़ी खोली थी। उस स्थान को तभी से नानकवाड़ा के नाम से जाना जाता है।
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नानकवाड़ा संभवत: एक मात्र ऐसा स्थल है, जहां गुरु नानकदेव महाराज की प्रस्तर प्रतिमा लगी हुई है। बाद में गुरु नानक ने निर्मल पंथ स्थापित किया। आगे चलकर सिखों के अंतिम और दसवें गुरु गोविंद सिंह ने निर्मल पंथ को निर्मल अखाड़ा के रूप में धर्म एवं संस्कृत के प्रचार के लिए आकार प्रदान किया। गुरु नानकदेव लाखों श्रद्धालुओं के स्नान करते देख बड़े प्रसन्न हुए।
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ब्रह्मकुंड पर उन्होंने पुरोहितों के समूह को उपदेश दिया। वे अपने पुरोहित के मकान में ही ठहरे। कुंभ मेलों और अन्य स्नानों के अवसर पर धर्मनगरी में जगह-जगह आध्यात्मिक चर्चा, प्रवचन, कथा वार्ता होते हैं। गुरु महाराज ने विष्णुघाट के गंगातट पर भक्तों के सन्मुख ज्ञान का प्रकाश किया। उस समय की भाषा में ऐसे ज्ञानियों के प्रवचनों को ज्ञान गोदड़ी खोलना कहा जाता था।
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