पिछली शताब्दी में वर्ष 1915 के कुंभ मेले में हरिद्वार की इस धरती पर दो ऐसे पन्ने लिखे गए, जो हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गए। इतिहास के इन पन्नों का नाता भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय के नाम से जुड़ा हुआ है।
Haridwar Kumbh 2021: साल 1915 के कुंभ में हरिद्वार में रचा गया था इतिहास, पढ़ें ये अनोखा किस्सा...
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बात तब की है जब हरिद्वार में ब्रिटिश सरकार द्वारा गंगा पर बांध का निर्माण किया जा रहा था। इसके खिलाफ 1014 से पंडा समाज यह कहते हुए आंदोलन कर रहा था कि बंधे जल में अस्थि प्रवाह एवं अन्य कर्मकांड शास्त्रीय दृष्टि से वर्जित हैं। पुरोहितों के आंदोलन का नेतृत्व महामना मदन मोहन मालवीय कर रहे थे। 1915 में जब कुंभ लगा तो महामना ने कुंभ में आए राजा महाराजाओं का सहयोग लेने के लिए हरिद्वार में डेरा जमा दिया था।
बताते हैं कि छोटे-बड़े 25 नरेश उस कुंभ में गंगा स्नान के लिए आए थे। महामना और पुरोहितों ने तीर्थत्व की रक्षा के लिए राजाओं को बांध विरोधी आंदोलन में भाग लेने के लिए राजी कर लिया। कुंभ के बाद बांध विरोधी आंदोलन ने जोर पकड़ा और कई रियासतों ने बांध का कार्य रोकने के लिए अपनी सेनाएं हरिद्वार भेज दी। यह आंदोलन अगले वर्ष तक चला।
बाद में ब्रिटिश सरकार और पुरोहितों के बीच वह ऐतिहासिक समझौता हुआ जो आज भी कायम है। अविच्छिन्न धारा छोड़ी गई और बांध अन्यत्र बना। कुंभ पर छेड़े गए आंदोलन की यह बड़ी जीत थी कि अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा । 1915 के कुंभ में महामना मालवीय ने मेला शिविर में अखिल भारतीय हिंदू महासभा की स्थापना की।
वीर सावरकर, हेडगेवार और भाई परमानंद जैसी हस्तियां उस बैठक में महामना के बुलावे पर हरिद्वार पहुंची थी। दरअसल, हिंदू सभा की स्थापना 1908 में पंजाब में हुई थी। हरिद्वार कुंभ में उसे राष्ट्रीय स्तर पर हिंदू महासभा का स्वरूप प्रदान किया। कालांतर में इसी महासभा से निकलकर मनीषियों ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।