त्रियुगीनारायण-केदारनाथ पैदल ट्रैक पर किमी 9 से 14 तक जगह-जगह पर कंकालों के ढेर लगे हुए हैं। रास्ते के दोनों तरफ यहां 50 से अधिक कंकाल मौजूद हैं। कुछ कंकालों पर अब भी कपड़े लिपटे हुए हैं। शनिवार को इस रुट से ट्रैकिंग कर केदारनाथ से लौटे त्रियुगीनारायण के 16 सदस्यीय ट्रैकिंग दल ने रास्ते में 50 से अधिक कंकालों के होने की बात कही। टीम ने बताया कि बीते वर्ष वन विभाग द्वारा बनाए गए ट्रैकिंग रुट के दोनों तरफ दो से तीन फिट की दूरी पर कंकाल पड़े हुए हैं।
केदारनाथ आपदा के तीन साल बाद एक बार फिर सामने आया नर कंकालों का 'रहस्य'
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कई जगहों पर कंकाल ढेरनुमा स्थिति में हैं, जिससे लगता कि एक साथ दो से चार लोग हो। दल नायक मिनाक्षी प्रसाद, सुदर्शन प्रसाद, सच्चिदानंद, पूर्णानंद आदि ने बताया कि कई कंकालों पर कपड़े लिपटे हुए हैं। जबकि कुछ पर चूड़ी व अन्य चीजें भी मिली हैं। जितने कंकाल मिले हैं, वे अधिकांश बड़ी उम्र के लोगों के हैं। दल में शामिल युवा आशीष गैरोला ने बताया कि जिस तरह से जिस तरह से कंकाल बिखरे पड़े हैं, उससे लगता है कि इस पूरे क्षेत्र में यह संख्या दो से तीन गुनी अधिक भी हो सकती है।
बता दें कि माउंटनियर्स एंड ट्रैकर्स एसोसिएशन उत्तराखंड के अध्यक्ष मनोज रावत ने बीते 13 अक्तूबर को देहरादून में मुख्यमंत्री हरीश रावत को त्रियुगीनायण-केदारनाथ ट्रैक पर 12 से अधिक कंकाल होने की बात बताई थी। सीएम ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीआरएफ और पुलिस को मामले की जांच के निर्देश दिए थे। इधर, बीते शुक्रवार को त्रियुगीनारायण गांव से भी 16 सदस्यीय ट्रैकिंग दल हकीकत जानने को निकला था।
ट्रैकिंग रुट पर मिले नर कंकालों में कुछ पर मिट्टी जमी हुई मिली है। जो बरसात से कुछ हद तक साफ हो गई है। आशीष गैरोला ने बताया कि वन विभाग द्वारा कुछ समय पूर्व रास्ता बनाया गया है। ऐसे में लगता है कि निर्माण के दौरान कंकालों को मिट्टी से ढक दिया गया हो, जिससे यह मामला उजागर न हो। लेकिन तेज बरसात के कारण मिट्टी बहने से कंकाल फिर नजर आने लगे हैं।
त्रियुगीनारायण-केदारनाथ ट्रैकिंग रुट से लौटे त्रियुगीनारायण गांव के ट्रैकर्स का कहना है कि इस ट्रैक पर किमी. 5, 12 और 19 पर पर्याप्त पानी है। लेकिन वन विभाग ने जिस तरह से ट्रैक का निर्माण किया है, वह कई सवाल खड़े करता है। केदारनाथ पहुंचने के लिए विकल्प के रूप में 1 करोड़ 40 लाख की लागत से बनाए गए 25 किमी के ट्रैक पर कई स्थानों पर मानक से अधिक कैंची दारामोड़ दिए गए हैं। जबकि इस ट्रैक को और सरल बनाने के साथ ही इसकी दूरी को 16 से 18 किमी के बीच समेटा जा सकता था।