उत्तराखंड सीमांत क्षेत्र में मौजूद गांव लोगों के पलायन के वीरान और खंडहर बन गए हैं। देश की सुरक्षा के नजरिए को ध्यान में रखकर इन क्षेत्रों को फिर से आबाद करना होगा।
देश की रक्षा के लिए सरकार को चीन सीमा से भगाने होंगे 'भूत'
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भागीरथी इको सेंसिटिव जोन का दायरा अगर कम हुआ तो चीन सीमा मजबूत होगी। इको सेंसिटिव जोन में केंद्र ने लैंड यूज, विकास कार्यों के लिए पर्वतीय स्लोप प्रतिशत बढ़ाने की ढील तो जरूर दी है, लेकिन यहां सड़कें आदि बनाए जाने में बंदिशें हैं।
अगर इसका दायरा कम कर दिया जाता है तो बाकी क्षेत्र में विकास तेज होगा। इससे चीन सरहद के भूतिया गांव फिर से आबाद हो सकेंगे। प्रदेश शासन दायरा कम करवाने के लिए केंद्र को अनुरोध पत्र भेज रहा है। प्रदेश शासन केंद्र से एक जुलाई, 2011 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के लिहाज से भागीरथी इको सेंसिटिव जोन का दायरा कम करवाना चाहता है।
यह गौमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथी के किनारे 135 किमी लंबी पट्टी आती है। भागीरथी के दोनों किनारों पर सौ-सौ मीटर क्षेत्र जोन के लिए प्रस्तावित किया गया था। इससे तकरीबन चार सौ वर्ग किमी का हिस्सा आता है। लेकिन बाद में यह 4179 वर्ग किमी हो गया। इससे कई क्षेत्रों पर बंदिशें लग गई हैं।
यहां की सड़कों की योजनाएं भी बाधित हो गईं। सड़कें न होने से आने-जाने में दिक्कत के कारण लोगों ने गांवों से पलायन शुरू कर दिया। गांव बिल्कुल खाली हो गए। ग्रामीणों के न रहने से चीन सीमा की गतिविधियों की सूचना पुलिस, प्रशासन को मिलना बंद हो गई। इसके ठीक उलट सरहद के पार चीन ने सड़कों का बेहतरीन जाल बिछाया है।