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पश्चिम एशिया की कूटनीति: ओमान दरवाजा, जो कभी बंद नहीं होता! सिद्धांत-सी बन गई है यह कहावत

Sun, 20 Sep 2026 07:52 AM IST
Anshuman Tiwari अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 20 Sep 2026 07:52 AM IST
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सार
2026 में होर्मुज जल रहा है। ईरान कहता है- टोल लगाएंगे। अमेरिका कहता है-पागल हो? और, बीच में ओमान बैठा है- दोनों से बात करता हुआ, किसी से न लड़ता हुआ। पश्चिम एशिया की कूटनीति में एक कहावत सिद्धांत-सी बन गई है कि जब दुनिया के सारे दरवाजे बंद होते हैं, तो एक दरवाजा हमेशा खुला रहता है। उसका नाम मस्कट है।
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West Asia Diplomacy amid Hormuz Crisis door of Oman never closes This saying practically become principle
पश्चिम एशिया में टकराव के बीच ओमान की भूमिका अहम - फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स

विस्तार

2015 में जब ईरान परमाणु समझौता (जेसीपीओए) घोषित हुआ, तो इसकी पृष्ठभूमि में ओबामा प्रशासन और ईरानी अधिकारियों की मस्कट के होटलों में संपन्न बैठकें थीं। जो काम संयुक्त राष्ट्र न कर सका, जो अमेरिकी विदेश विभाग न कर सका-वह एक छोटे-से रेगिस्तानी देश ने अपने होटल के कमरे में कर दिया। मगर ओमान पहला नहीं है। इतिहास में जब भी दुनिया जली है, कोई न कोई शांत कोना बचा है।



ईरान की जंग सात महीने पुरानी है। होर्मुज जल रहा है। अमेरिका कहता है-होर्मुज सबका है, खुला रहना चाहिए। ईरान कहता है-होर्मुज पर हमारा हक है, टोल लगाएंगे। दोनों एक-दूसरे की तरफ मिसाइलें ताने खड़े हैं। और इन दोनों के बीच है ओमान।


जरा इसे समझिए। ओमान ने ईरान को एक प्रस्ताव दिया है-चलो दोनों मिलकर होर्मुज का रास्ता चलाते हैं। खाड़ी के अरब देशों की पीठ पर, अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) के साथ मिलकर ओमान ईरान के साथ होर्मुज पर नियंत्रण करने को तैयार है। ओमान ने जून में अस्थायी शिपिंग मार्ग भी खोले, युद्ध की आग के बीच जहाजों को रास्ता दिया। अमेरिका ओमान पर दबाव डाल रहा है-ईरान से रिश्ते तोड़ो। ओमान कह रहा है-नहीं। हम बात कर रहे हैं, लड़ नहीं रहे।

एक छोटा-सा रेगिस्तानी देश। करीब 50 लाख की आबादी। न बड़ी फौज, न परमाणु हथियार, न अरबों का तेल भंडार। मगर दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें इसका दरवाजा खटखटा रही हैं, क्योंकि यह अकेला दरवाजा है, जो दोनों तरफ खुलता है।

टाइम मशीन के यात्रियो, तटस्थता कमजोरी नहीं है। कभी-कभी यह सबसे ताकतवर हथियार होती है। इतिहास में जब भी दुनिया जली है, एक शांत कोना रहा है, जिसने दोनों पक्षों से बात की, दोनों की सुनी, और चुपचाप रास्ता निकाला। आइए। सीट पकड़िए। चलते हैं ओमान के सफर पर। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह छोटा-सा देश कभी समुद्री साम्राज्य हुआ करता था।

यह 17वीं-19वीं सदी का मस्कट है। जरा स्क्रीन पर देखिए। यह वह ओमान नहीं, जो आज नक्शे पर एक पतली पट्टी की तरह दिखता है। यह ओमानी साम्राज्य है-हिंद महासागर पर राज। जंजीबार ओमान का था। मोम्बासा ओमान का। बलूचिस्तान का तट ओमान का। ग्वादर-हां, वही ग्वादर, जो आज चीन-पाकिस्तान गलियारे का केंद्र है, भी ओमान का था। 1958 में सुल्तान सईद ने ग्वादर पाकिस्तान को बेचा-30 लाख डॉलर में। आज ग्वादर अरबों डॉलर का बंदरगाह है। भारत के काठियावाड़ के व्यापारी मस्कट के बाजारों में बैठते थे। गुजराती, कच्छी, सिंधी-सब मस्कट में। ओमान भारत का सबसे पुराना अरब कनेक्शन है-सऊदी से पहले, दुबई से पहले, कतर से बहुत पहले। मगर ओमान की असली ताकत फौज नहीं थी, व्यापार था। और, व्यापार के लिए सबसे जरूरी चीज है हर किसी से बात करना। दुश्मन से भी। इसीलिए, ओमान ने कभी किसी से दुश्मनी नहीं की।

अब टाइम मशीन बढ़ रही है, आपको उस आदमी से मिलाने, जिसने कूटनीतिक तटस्थता को एक कला बना दिया। 1970-2020। वह आपके सामने है-सुल्तान काबूस बिन सईद। उम्र 50 साल। एक नीति-सबसे बात करो, किसी से लड़ो मत। काबूस ने ईरान से रिश्ते रखे, जब पूरी खाड़ी ईरान से लड़ रही थी। इस्राइल से रिश्ते रखे, जब कोई अरब देश इस्राइल का नाम नहीं लेता था। नेतन्याहू 2018 में मस्कट आए, सुल्तान से मिले। सऊदी अरब से रिश्ते रखे। अमेरिका से रिश्ते रखे। भारत से रिश्ते रखे। और, सबसे बड़ा कारनामा? जिसके आप गवाह बन रहे हैं, वह पूरी दुनिया को बाद में पता चलेगा। यह 2013 है और यहां मस्कट में ओबामा प्रशासन और ईरान के बीच खुफिया बातचीत चल रही है। दो साल तक किसी को इसके बारे में पता नहीं चलेगा। अमेरिकी और ईरानी अधिकारी मस्कट के होटलों में मिल रहे हैं, जैसे कोई जासूसी उपन्यास हो। ईरान के साथ शांति की कोशिश इसी खुफिया आयोजन में बन रही है।

अब आप 2015 में हैं। ईरान परमाणु समझौता (जेसीपीओए) घोषित हो रहा है, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, चीन, जर्मनी और यूरोपीय समुदाय शामिल हैं। जो काम संयुक्त राष्ट्र (यूएन) न कर सका, जो अमेरिकी विदेश विभाग न कर सका, वह एक छोटे-से रेगिस्तानी देश ने अपने होटल के एक कमरे में कर दिया। मगर ओमान पहला नहीं है। इतिहास में जब भी दुनिया जली है, कोई न कोई शांत कोना बचा है।

आइए कुछ और ओमान देखते हैं। टाइम मशीन स्विट्जरलैंड आ गई है। 1515 से तटस्थ। 500 साल से ज्यादा। दो विश्वयुद्ध-स्विट्जरलैंड ने दोनों में हिस्सा नहीं लिया। हिटलर की सेना चारों तरफ से घेरे थी, लेकिन स्विट्जरलैंड को नहीं छुआ। क्यों? क्योंकि स्विट्जरलैंड के बैंकों में नाजियों का भी पैसा था और मित्र राष्ट्रों का भी। दोनों पक्षों को स्विट्जरलैंड जिंदा चाहिए था।
रेड क्रॉस-जिनेवा में बना। संयुक्त राष्ट्र का यूरोपीय मुख्यालय भी जिनेवा में। हर जंग के बीच बातचीत भी जिनेवा में। तटस्थता ने स्विट्जरलैंड को यूरोप का सबसे अमीर और सबसे सुरक्षित देश बनाया, क्योंकि जो नहीं लड़ता, वही सबसे ज्यादा कमाता भी है।

अब दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा है, मगर हम स्वीडन आ गए हैं। स्वीडन ने दोनों तरफ खेला और दोनों तरफ से बचा। जर्मनी को लौह अयस्क बेचा, जिससे जर्मन टैंक बने। और, उसी वक्त डेनमार्क के यहूदियों को शरण दी। 8,000 डेनिश यहूदियों को मछली की नावों में स्वीडन ले जाया गया। स्वीडिश तटरक्षकों ने आंखें बंद कर लीं।

राउल वॉलनबर्ग का किस्सा अपने सीट की स्क्रीन पर देखिए। इस स्वीडिश राजनयिक ने बुडापेस्ट में हजारों हंगेरियन यहूदियों को नकली स्वीडिश पासपोर्ट बांटकर बचाया। नाजियों की नाक के नीचे। वॉलनबर्ग 1945 में सोवियत गिरफ्त में गायब हो गए, या शायद मारे गए। तटस्थ देश का नागरिक, जिसने दोनों पक्षों को चकमा देकर हजारों जानें बचाईं।

अब अब हम आ गए हैं 1978 के वेटिकन में। यहां वह कहानी बनी है, जो बहुत कम लोग जानते हैं। अर्जेंटीना और चिली के बीच बीगल चैनल का विवाद था। दक्षिण अमेरिका के दो देश जंग के कगार पर थे। दोनों के पास सेनाएं तैनात। तोपें तैयार। युद्धपोत भेजे जा चुके।  पोप जॉन पॉल द्वितीय ने हस्तक्षेप किया। एक कार्डिनल भेजा-एंटोनियो सामोरे। शटल डिप्लोमेसी। ब्यूनस आयर्स और सैंटियागो के बीच। महीनों बातचीत चली। जंग टली। 1984 में संधि हुई। पोप ने वह किया, जो संयुक्त राष्ट्र नहीं कर सका-दो देशों को लड़ने से रोका। एक आदमी जिसके पास न सेना है, न मिसाइल, सिर्फ नैतिक अधिकार से उसने जंग टाल दी। 

और कतर को भी नहीं भूलना चाहिए। यह आज की कहानी है। एक छोटा-सा प्रायद्वीप-सऊदी अरब से जुड़ा, बस इतना बड़ा कि उसमें एक शहर समा जाए। मगर कतर ने वह किया, जो किसी बड़े देश ने नहीं किया-सबको जगह दी। तालिबान का राजनीतिक कार्यालय-दोहा में। हमास का दफ्तर-दोहा में। अल जजीरा-दोहा से। अमेरिकी सैन्य अड्डा अल उदैद भी दोहा में। 2017 में सऊदी, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन ने कतर की नाकाबंदी की-तीन साल। कतर टूटा नहीं। तुर्किये और ईरान से मदद ली। नाकाबंदी हटी। दुनिया की कूटनीति में इन छोटे देशों का सबक पढ़ा जाता है। ये यह सिखाते हैं कि तटस्थता सिर्फ कमजोर का नहीं, चतुर का हथियार है।

टाइम मशीन वापस लौट रही है। हम मस्कट में उतर रहे हैं। 2026 में होर्मुज जल रहा है। ईरान कहता है-टोल लगाएंगे। अमेरिका कहता है-पागल हो? और, बीच में ओमान बैठा है-दोनों से बात करता हुआ, किसी से न लड़ता हुआ। इतिहास फिर लिख रहा है कि पश्चिम एशिया का जब हर दरवाजा बंद होता है, तो एक दरवाजा खुला रहता है। हमेशा खुला रहता है। उसका पता-मस्कट, ओमान।
फिर मिलते हैं अगले सफर पर...

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