कंकर-कंकर में शंकर की नगरी काशी। मंदिरों की नगरी काशी। मोक्ष से प्रकाशित इस अविमुक्त क्षेत्र में हर कोई प्रकाश की खोज में ही आता है। देशी-विदेशी सब साधक, शोधक बनकर यहां विचरते मिल जाते हैं। शिव-पार्वती के इस आनंद कानन ने काल के हर खंड को देखा-भोगा है। यहां बहुत कुछ ऐसा है, जिसे समय ने धुंध की चादर से ढक दिया था। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना(kashi vishwanath corridor project) में अधिगृहीत मकानों पर जब छैनी-हथौड़े चले तो बरसों से सुसुप्तावस्था में पड़े मंदिर बाहर झांकने लगे।
अतिक्रमण हटने के बाद जैसे-जैसे परत और धूल हटती गई, बेजोड़ शिल्प की कलाकृतियां मुस्कुराने लगीं। दीवारों पर उत्कीर्ण गंधर्व मानों प्रफुल्लित होकर नृत्य करने लगे। कलाकारों की साधना दर्शनीय हो गई। हर कोई इन मंदिरों को देखता रह जाता है। प्रशासन द्वारा 30 मंदिरों की सूची जारी की गई थी लेकिन उसके अलावा अन्य मंदिर भी सामने आए हैं। दीवारों पर चोट जारी है। क्या पता कोई और सोया हुआ शिल्प जागकर सामने आ जाए।
ललिता घाट स्थित विशाल मांधातोश्वर मंदिर एक मकान की ओट में छिपा हुआ था। इसका मुख्य शिखर पिरामिड के आकार है जो अपने आप में अनूठा है।
बुधवार दोपहर नीलकंठ गली स्थित एक मकान में शिखर नजर आया। गुरुवार को जब दीवारें टूटीं तो मंदिर का स्वरूप भी सामने आ गया। इसका नाम ज्वरर्हेश्वराय महादेव है।
मणिकर्णिका गली स्थित इंद्र समुद्रेश्वर मंदिरों की इस माला में मणि जैसा चमकता है। यह स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।