आज दुनिया मिसाइलों और रॉकेटों के जरिए जंग लड़ती है। हर देश तरह-तरह की मिसाइलें अपने हथियारों के जखीरे में रखता है ताकि दुश्मन को दूर से ही नेस्तनाबूद किया जा सके। भारत के पास भी, पास और दूर तक मार करने वाली कई तरह की मिसाइलें हैं। इनमें से कुछ मिसाइलों को अंतरिक्ष में सैटेलाइट लॉन्च करने वाले रॉकेट में तब्दील कर लिया गया है। पर, क्या आपको पता है कि मिसाइल बनाने का काम किस देश ने सबसे पहले शुरू किया था? आप इस सवाल का जवाब सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे। जर्मनी वो पहला देश था जिसने युद्ध में मिसाइलों का इस्तेमाल करने की सोची थी।
दुनिया की पहली मिसाइल फैक्ट्री बनने वाला गांव, जिसपर ब्रिटिश एयरफोर्स ने किया था हमला
नाजी सरकार
ये बात दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की है। जर्मनी का एक गांव मिसाइल फैक्ट्री के तौर पर विकसित किया गया था। इस गांव का नाम है, पेनमुंडे। ये गांव जर्मनी के यूसडम द्वीप में पेन नदी के मुहाने पर स्थित है। पेन नदी, यहां पर आकर बाल्टिक सागर में गिरती है। यूसडम द्वीप यूं तो अपने शानदार बीच और मछली से बने सैंडविच के लिए मशहूर है। ऐतिहासिक काल में भी यहां के द्वीप प्रशिया की राजशाही के बीच बेहद लोकप्रिय थे। बाद में पूर्वी जर्मनी के लोग भी यहां छुट्टियां बिताने आया करते थे। मगर 1936 से 1945 के बीच इस द्वीप के पेनमुंडे गांव को नाजी सरकार ने अपने बेहद खुफ़िया मिशन का अड्डा बनाया था। 1935 में जर्मन इंजीनियर वर्नहर वॉन ब्रॉन ने पेनमुंडे गांव को अपने मिसाइल के कारखाने के लिए चुना था। इसके आसपास का चार सौ किलोमीटर का इलाका सुनसान था।
रॉकेट टेक्नोलॉजी
ब्रॉन ने सोचा कि ये जगह उनके रॉकेट के परीक्षण के लिए बिल्कुल सही रहेगी। सरकार से इजाजत मिलने के बाद यहां मिसाइल का कारखाना और टेस्टिंग रेंज स्थापित करने का काम बड़ी तेजी से हुआ। करीब 12 हजार लोगों ने यहां दिन-रात काम करके दुनिया की पहली क्रूज मिसाइल बनाने की फ़ैक्ट्री और टेस्टिंग रेंज को तैयार किया। ये फ़ैक्ट्री करीब 25 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली थी। पेनमुंडे में होने वाला रिसर्च और मिसाइल टेस्ट, दुनिया के सबसे बड़े युद्ध के लिए ही अहम नहीं थे, बल्कि आने वाले वक्त के लिए भी बेहद अहम साबित हुए। इस गांव में ही रॉकेट तकनीक की बुनियाद रखी गई जिसकी मदद से आगे चलकर इंसान ने अंतरिक्ष का सफ़र शुरू किया।
आज पेनमुंडे गांव एक उजाड़ जगह है। इमारत के नाम पर लाल रंग का एक पॉवर स्टेशन बचा है जिसमें पेनमुंडे हिस्टोरिकल टेक्निकल म्यूजियम स्थापित किया गया है। पूरे इलाके में रॉकेट के टुकड़े, पतवार, इंजन और दूसरे यंत्र बिखरे हुए हैं। इन्हें देखकर खौफ़ का एहसास होता है।
दूसरा विश्व युद्ध
इस जगह की अहमियत एक भाषण के दस्तावेज से साबित होती है। ये भाषण वाल्टर डॉर्नबर्गर ने 1942 में लिखा था जिसमें वॉल्टर ने जर्मनी के रॉकेटर एग्रीगेट 4 (A-4) के कामयाब परीक्षण का जिक्र किया था। ये दुनिया का पहला लंबी दूरी तक मार करने वाला रॉकेट था। इसका दूसरा नाम 'वेंजियंस वेपन' या बदला लेने वाला हथियार था। ये किसी भी इंजीनियर का ख्वाब हो सकता था। एक ऐसी मशीन को विकसित न करना, जो कि अपने वक्त के लिहाज से बेहद क्रांतिकारी थी। जिस देश के पास भी ये तकनीक होती, वो देश सामिरक और आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर हो जाता। इसकी मदद से वो राजनैतिक रूप से भी बहुत ताकत इकट्ठी कर सकता था।
इस रॉकेट के परीक्षण के बाद वॉल्टर डॉर्नबर्गर और वर्नहर वॉन ब्रॉन जैसे वैज्ञानिक ये मानते थे कि इसकी मदद से वो दूसरा विश्व युद्ध आसानी से जीत जाते। जर्मनी में नए हथियारों के विकास के लिए जिम्मेदार अल्बर्ट स्पीर भी इससे सहमत थे। मगर जर्मनी के तानाशाह हिटलर को इस पर यकीन नहीं था।
यहूदी युद्धबंदी
इसलिए, जर्मनी की सरकार ने रॉकेट के सफल परीक्षण को ज्यादा भाव नहीं दिया। जब हिटलर ने 1939 में युद्ध का एलान किया तो, पेनमुंडे का कारखाना उस वक्त पूरी तरह से तैयार नहीं था। इसके बाद जर्मन सरकार युद्ध में फंस गई और उसने पेनमुंडे में मिसाइलों के विकास पर न तो पैसा खर्च किया और न ही उसे अहमियत दी। 1943 मे तमाम कोशिशों के बाद डॉर्नबर्गर और वॉन ब्रॉन ने A-4 रॉकेट के कामयाब परीक्षण की एक फ़िल्म हिटलर को दिखाई। तब जाकर हिटलर ने इस मिसाइल के निर्माण को हरी झंडी दी। लेकिन, तब तक युद्ध के मोर्चे पर बहुत देर हो चुकी थी। जर्मन फ़ौजें कई मोर्चों पर हार रही थीं।
जून, 1943 में यहूदी युद्धबंदियों को इस कारखाने में काम पर लगाया गया। ये युद्धबंदी यूरोप के अलग-अलग देशों से लाए गए थे। इसी दौरान ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को भी पेनमुंडे के इस खुफ़िया रॉकेट कारखाने की भनक लग गई। फिर 17 अगस्त 1943 को ब्रिटिश रॉयल एयरफ़ोर्स से उस वक्त का सबसे बड़ा हवाई हमला पेनमुंडे पर किया।