लार्ड मेयो को भारत के सबसे घुमक्कड़ वायसरायों में गिना जाता है। भारत के चौथे वायसराय लॉर्ड मेयो ने भारत में अपने तीन वर्ष के कार्यकाल के दौरान करीब बीस हजार मील का सफर तय किया था। इसमें से अधिकतर सफर घोड़े की पीठ पर बैठ कर किया गया था। उनके बारे में मशहूर था कि वो एक दिन में घोड़े की पीठ पर बैठ कर 80 मील तक चले जाया करते थे। इसके अलावा उन्होंने भारत में अपनी नियुक्ति के दौरान यातायात के उन सभी साधनों का उपयोग किया जो उस समय अंग्रेजों को उपलब्ध थे - स्टीमर, रेल, हाथी, याक और यहां तक कि ऊंट भी।
जब कालापानी में इस पठान ने कर दी भारत के चौथे अंग्रेज वायसराय लॉर्ड मेयो की हत्या
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जे एच रिवेट कार्नाक अपनी किताब 'मेनी मेमोरीज' में लिखते हैं, 'एक बार मध्य भारत में जब मेयो को पता चला कि एक स्थान पर जाने के लिए सिर्फ बैलगाड़ी का ही सहारा लिया जा सकता है, उन्होंने अपने पायजामे के ऊपर एक कोट पहना और बैलगाड़ी में बिछी पुआल पर लेट गए। उन्होंने अपना सिगार सुलगाकर एलान किया कि इससे सुकून की जगह हो ही नहीं सकती। सुबह अपने गंतव्य पर पहुंच कर उन्होंने कहा मुझे बहुत अच्छी नींद आई। नीचे उतर कर उन्होंने अपनी यूनिफॉर्म पहनी और अपने कोट पर लगे पुआल के तिनके को झाड़ कर नीचे गिराया।'
अंतिम समय पर माउंट हैरियट जाने की योजना बनी
वर्ष 1872 में लॉर्ड मेयो ने तय किया कि वो बर्मा और अंडमान द्वीपों की यात्रा पर जाएंगे। अंडमान में उस समय खतरनाक कैदियों को रखा जाता था और इससे पहले किसी वायसराय या गवर्नर जनरल ने अंडमान का दौरा नहीं किया था। पहली बार 1789 में लेफ्टिनेंट ब्लेयर के मन में अंडमान में बस्ती बसाने का विचार आया था। लेकिन 1796 में अंग्रेजों ने मलेरिया फैल जाने और स्थानीय जनजातियों के विरोध की वजह से इन द्वीपों को छोड़ दिया था।
वर्ष 1858 में अंग्रेजों ने यहां खतरनाक कैदियों को भेजना शुरू किया। पहली बार जनवरी 1858 में 200 कैदियों का जत्था यहां पहुंचा। जब लॉर्ड मेयो अंडमान गए तो वहां की कुल जनसंख्या 8,000 थी जिसमें 7,000 कैदी, 900 महिलाएं और 200 पुलिसकर्मी थे।
मेयो की अंडमान यात्रा 8 फरवरी, 1872 को शुरू हुई। सुबह नौ बजे उनके जहाज ग्लास्गो ने पोर्टब्लेयर की जेटी पर लंगर डाला। उतरते ही उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई। उसी दिन उन्होंने रॉस आइलैंड पर यूरोपीय बैरकों और कैदियो के कैंप का मुआयना किया। उन्होंने अपने दल के साथ चाथम द्वीप का दौरा किया। जब चाथम द्वीप पर उनके सभी कार्यक्रम समय से पहले समाप्त हो गए तो उन्होंने कहा कि अभी सूरज डूबने में एक घंटा बाकी है। क्यों न समय का सदुपयोग करते हुए माउंट हैरिएट का नजारा लिया जाए।
अंधेरे में शेर अली आफरीदी ने किया छुरे से वार
सर विलियम विल्सन हंटर जो इस यात्रा में मेयो के साथ थे, मेयो की जीवनी 'लाइफ ऑफ अर्ल ऑफ मेयो' में लिखते हैं, 'माउंट हैरियेट करीब 1,116 फीट की ऊंचाई पर था। उसकी चढ़ाई सीधी और बहुत सख्त थी। कड़ी धूप में चढ़ते हुए उनके दल के अधिकतर सदस्य थक कर निढाल हो गए थे। लेकिन मेयो इतने तरोताजा थे कि उन्होंने एक साथ चल रही घोड़ी पर चढ़ने से ये कहते हुए मना कर दिया कि इसका इस्तेमाल कोई और कर ले। चोटी पर पहुंच कर उन्होंने 10 मिनट तक सूर्यास्त का आनंद लिया और अपने आप से कहा कितना हसीन है ये सब!'
जब तक मेयो का दल वापस जाने के लिए नीचे उतरा अंधेरा घिर आया था। होपटाउन जेटी पर एक नौका वायसराय को उनके जहाज तक ले जाने के लिए इंतजार कर रही थी। मशाल लिए हुए कुछ लोग मेयो के आगे चल रहे थे। मेयो के दाहिने तरफ उनके निजी सचिव मेजर ओवेन बर्न और बाएं तरफ अंडमान के चीफ कमिश्नर डोनाल्ड स्टीवर्ट थे। मेयो नौका पर चढ़ने ही वाले थे कि स्टीवर्ट गार्ड्स को निर्देश देने आगे बढ़ गए। तभी झाड़ियों में छिपे एक लंबे पठान ने मेयो की पीठ पर छुरे से वार किया।
हंटर लिखते हैं कि 'मशाल की रोशनी में लोगों ने एक आदमी का हाथ और छुरा उठते हुए देखा। उसने मेयो के दोनों कंधों के बीच दो बार छुरे का वार किया। मेयो के सचिव मेजर बर्न ने देखा कि एक शख्स चीते की तरह मेयो की पीठ पर सवार हो गया था। दो सेकेंड के अंदर ही हत्यारे को पकड़ लिया गया। घुटने भर पानी में गिरे मेयो ने किसी तरह अपनेआप को ऊपर उठाया और अपने सचिव से बोले 'बर्न दे हैव डन इट।' फिर उन्होंने ऊंची आवाज में चिल्ला कर कहा, मुझे नहीं लगता कि मुझे ज्यादा चोट लगी है। ये कहते ही मेयो दोबारा गिर गए। उनके सिलेटी रंग के कोट की पीठ उनके खून से लाल हो गई। वहां मौजूद लोगों ने उनका कोट फाड़ दिया और रुमाल और अपने हाथों से बहते हुए खून को रोकने की कोशिश की। कुछ सैनिकों ने उनके हाथ और पांव मलने शुरू कर दिए।'