Science News: अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने के लिए लंबे समय से वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं। इस दौरान वैज्ञनाकि आए दिन नई-नई खोज करते हैं। अब वैज्ञानिकों को एक बड़ी कामयाबी मिली है। उन्होंने धरती से 31 प्रकाश वर्ष दूर एक ऐसे ग्रह (एक्सोप्लैनेट) की खोज की है जिस पर जीवन संभव है। यह ग्रह इंसानों के रहने लायक है। वैज्ञानिकों ने अभी तक हमारे सौर मंडल के बाहर 5200 से ज्यादा ग्रह खोजे हैं, लेकिन इनमें सिर्फ 200 ही इंसानों के रहने लायक हो सकते हैं।
Science News: वैज्ञानिकों को मिला धरती से भी बड़ा ग्रह, जहां रह सकता है इंसान, पानी होने की भी संभावना
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हाल ही में यह स्टडी एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स जर्नल में प्रकाशित हुई है। जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर एस्ट्रोनॉमी की वैज्ञानिक डायना कोसाकोवस्की ने इसके बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वोल्फ 1069बी की स्टडी से साफ है कि वहां जीवन संभव है।
डायना ने बताया कि वोल्फ 1069बी 15 दिन में अपने तारे का चक्कर लगा रहा है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर बताया कि बुध ग्रह हमारे तारे यानी सूरज से बहुत नजदीक है और 88 दिन में वह सूरज का चक्कर लगाता है। सूरज के बेहद करीब होने की वजह से वहां की सतह का तापमान 430 डिग्री सेल्सियस है। वोल्फ 1069बी कम समय में अपने तारे का चक्कर लगाता है, लेकिन वह रहने लायक दूरी पर स्थित है।
डायना का कहना है कि वोल्फ 1069बी का तारा एक रेड ड्वार्फ है यानी सूरज से छोटा है। इसके साथ ही सूरज से लगभग 65 प्रतिशत कम रेडिएशन छोड़ता है। इससे साफ है कि वहां पर इंसानों का रहना आसान हो सकता है। सबसे खास बात यह है कि ग्रह की सतह का तापमान माइनस 95.15 डिग्री सेल्सियस से 12.85 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है जबकि औसत तापमान माइनस 40.14 डिग्री सेल्सियस है। इस ग्रह पर तापमान के हिसाब से इंसान रह सकता है।
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डायना ने बताया वोल्फ 1069बी की खास बात यह है कि वह तारे के पास लॉक्ड पोजिशन पर मौजूद है। इसका मतलब यह है कि एक तरफ हमेशा रोशनी और दूसरी तरफ पूरा अंधेरा रहता है। उदाहरण के तौर पर हमारी पृथ्वी के चारों तरफ चांद चक्कर लगाता है। इसकी वजह से एक हिस्से में ही रोशनी रहती है, दूसरे में अंधेरा। खोज गए ग्रह पर धरती की तरह दिन-रात नहीं होता है। यानी दिन वाले इलाके में रहा जा सकता है। CARMENES टेलिस्कोप से इस ग्रह की खोज की गई है। डायना का कहना है कि किसी बाहरी ग्रह पर जीवन की मौजूदगी का पता लगाने में अभी 10 साल और लगेंगे।