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लाहौर की वो विद्रोही रानी, जो अपने बेटे के लिए शेरनी की तरह लड़ी थी

Wed, 15 Jul 2020 08:08 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नवनीत राठौर Updated Wed, 15 Jul 2020 08:08 PM IST
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maharaja duleep singh and his mother love
महारानी जिन्द कौर और उनके पुत्र - फोटो : सोशल मीडिया

सिख साम्राज्य के महाराजा रणजीत सिंह की खूबसूरत पत्नी महारानी जिन्द कौर को 'विद्रोही रानी,' 'द मिसालिना ऑफ़ पंजाब' और 'द क्वीन मदर' जैसे नामों से याद किया जाता है। 'उन्हें रानी जिन्दां' भी कहा जाता है। वह सिखों के शासनकाल में पंजाब के लाहौर की अंतिम रानी थीं।



कुत्तों के रखवाले की बेटी से उत्तर भारत की सबसे शक्तिशाली महारानी बनने वाली जिन्द कौर की कहानी भारतीय लोक कथाओं का हिस्सा रही है। इतिहासकारों ने जिन्द कौर को 'साहसी महिला' करार दिया है जो 1846 में सिखों और अंग्रेजों के बीच पहली लड़ाई में सिखों की हार के बाद ब्रिटिश कैद से एक नौकरानी का वेश धरकर फ़रार हो गई थीं।

maharaja duleep singh and his mother love
महारानी जिन्द कौर और उनके पुत्र - फोटो : सोशल मीडिया

जिन्द कौर ने भागने के बाद संभवत नेपाल में शरण ली जो उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन नहीं था। हालांकि वह अपने नौ वर्षीय बेटे दिलीप सिंह को साथ नहीं ले जा पाई थीं, जो अंग्रेजों के हाथ आ गए। नौ साल की उम्र में दिलीप सिंह को क्वीन विक्टोरिया के पास रहने के लिए भेज दिया गया थ, जहां वे ईसाई हो गए और 'ब्लैक प्रिंस' के नाम से मशहूर हुए।

प्रसिद्ध वृत्तचित्र निर्माता माइकल सिंह ने महारानी जिन्दां पर 'विद्रोही रानी' नाम से फ़िल्म बनाई है। उनका कहना है कि जिन्द कौर ने अपने बेटे की सुरक्षा के लिए जो कुछ संभव था वह किया। माइकल सिंह बताते हैं, "महाराजा रंजीत सिंह की मौत के बाद भड़की खूनी घटनाओं के बीच सिंहासन के वारिस दिलीप सिंह वहां से बच निकलने में कामयाब हुए तो उसमें महारानी जिन्दां की अहम भूमिका थी।"

"महारानी जिन्दां ने अपने पुत्र दिलीप सिंह को न केवल जीवित रखने बल्कि पंजाब के सिंहासन प्राप्त करने के लिए एक शेरनी की तरह लड़ीं।"

maharaja duleep singh and his mother love
महारानी जिन्द कौर और उनके पुत्र - फोटो : सोशल मीडिया

प्यार भरे पत्र
ब्रिटिश लाइब्रेरी में महारानी जिन्दां और दिलीप सिंह के बीच लिखे गए दो पत्र हैं जो दिल को छू लेते हैं। पहला पत्र महाराजा दिलीप सिंह ने लिखा है जिसमें वे अपनी माता जिन्द कौर को 'बीबीजी' कहकर संबोधित करते हैं।

पहला पत्र
"बीबीजी,

मैंने आज अटॉर्नी की वो कॉपी देखी है, जो आपने राज्यपाल मोहन टैगोर को दी थी और मुझे लगता है कि गंगा के किनारे आपके आवास के लिए अनुमति प्राप्त करने के योग्य हो जाऊंगा।

मैं आपसे मिलने और भारत आने के लिए लंबे अरसे से व्याकुल हूं, लेकिन अस्थिरता के चलते ऐसा नहीं हो सका। इसलिए मैंने भारत आने के लिए परमिट प्राप्त करने को आगामी सर्दियों तक टाल दिया है। मुझे उम्मीद है कि आप भी इंग्लैंड और भारत के बीच तनाव को देखते हुए इंग्लैंड आने का विचार छोड़ देंगी। मैं उम्मीद करता हूं कि आप ठीक होंगी और आपकी आंख की वो मुश्किल परेशान नहीं कर रही होगी जो मेरे लाहौर रहते हुए थी। '

भरोसा रखें.

मेरी प्यारी मां

आपका सबसे प्यारा बेटा

दिलीप सिंह

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महारानी जिन्द कौर और उनके पुत्र - फोटो : सोशल मीडिया

दिलीप सिंह ने यह पत्र 22 साल की उम्र में अपनी मां को लिखा था जब रानी जिन्दां 43 साल की थीं। 11 साल से दोनों के बीच कोई संपर्क नहीं स्थापित हो पाया था। प्रिया अटवाल ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में महारानी जिन्दां पर पीएचडी कर रही हैं। उनका कहना है कि दिलीप सिंह के पत्र में चिंता जाहिर होती है जबकि महारानी जिन्दां के पत्र में भावनाओं के सैलाब जैसा है।

हालांकि अटवाल का मानना है कि जो पत्र मां-बेटे ने एक-दूसरे को लिखे थे, मूल रूप में वो पत्र ये नहीं हैं। उनके दावे के मुताबिक ये उनकी नकल कॉपी हैं जिन्हें ब्रिटिश निगरानी दल ने सरकार के रिकॉर्ड में जमा कराए होंगे।

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महारानी जिन्द कौर और उनके पुत्र - फोटो : सोशल मीडिया

दरअसल, ब्रिटिश सरकार मां-बेटे के बीच संबंधों पर नजर रखती थी क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि जिन्द कौर दिलीप सिंह की राजनीतिक सोच समझ को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती हैं। महाराजा दिलीप सिंह पर काफी गहरी जानकारी और समझ रखने वाले पीटर बैंस का कहना है, "महारानी जिन्दां अपने बेटे दिलीप सिंह से अलग होने की वजह से बहुत उदास थीं और वह किसी भी कीमत पर अपने बेटे के साथ रहना चाहती थीं। वह ब्रिटिश सरकार को लिखे जाने वाले पत्र में कहती हैं कि दिलीप सिंह को उनसे अलग कर दिया जिन्हें उन्होंने नौ महीने अपनी कोख में रखा था।"

जिन्द कौर ने नेपाल में 11 साल तक निर्वासित जीवन बिताया और इस दौरान उनका अपने बेटे के साथ कोई संपर्क नहीं था। ऐसे में बेटे की ओर से अचानक मिलने वाले पत्र पर अपनी भावनाओं को संभाल पाना उनके लिए वास्तव में कठिन रहा होगा, लेकिन जिन्द कौर ने ये काम बखूबी कर लिया। कभी 'विद्रोही रानी' कहलाने वाली जिन्द कौर अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुकी थीं, उनका स्वास्थ्य खराब रह रहा था। अपने इकलौते बेटे की एक झलक देखने की इच्छा मन में लिए उन्होंने अपने इ बेटे को 'दूल्हा जी' कहकर पुकारा है।

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